संस्थापक (बानियान-ए-किराम)

हज़रत मौलाना अहमद अली मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.)

सहारनपुर शहर के जिस धार्मिक और अध्यात्मिक मिट्टी से हज़रत मौलाना वजीहुद्दीन साहिब सहारनपुरी, फक़ीह-ए-इस्लाम हज़रत मौलाना सआदत अली साहिब सहारनपुरी जैसे सैकड़ों बड़े विद्वान और नेताओं का जन्म हुआ, उसी पवित्र मिट्टी से मुहद्दिस कबीर हज़रत मौलाना अहमद अली मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) का जन्म 1225 हिजरी (1810 ईस्वी) में सहारनपुर में हुआ।

नाम और वंश:

हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) सहारनपुर के एक ऐसे अंसारी परिवार के चश्म-ओ-चराग थे, जो अपनी श्रेष्ठ धार्मिक, अध्यात्मिक और महान व्यक्तित्व की वजह से प्रसिद्ध है। आपका वंश इस प्रकार है:
"मौलाना अहमद अली बिन शेख लुत्फुल्लाह बिन शेख मोहम्मद जमील बिन शेख अहमद बिन शेख मोहम्मद बिन शेख बदरुद्दीन बिन शेख सदरुद्दीन बिन शेख अबू सईद बिन शेख जोहर अंसारी (खलीफा हज़रत शेख अब्दुल कुद्दूस गंगोहवी)"

शिक्षा और प्रशिक्षण

लगभग 18 साल तक खेल और कबूतरबाजी जैसी अनावश्यक गतिविधियों में समय बिताया। शिक्षा की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। इसका बहुत गहरा दुख और आंतरिक भावना फकीहुल इस्लाम हज़रत मौलाना मुफ़्ती सआदत अली (रह.) को थी। हज़रत मुफ़्ती सआदत अली (रह.) ने एक व्यक्ति के माध्यम से मौलाना अहमद अली (रह.) से एक धार्मिक प्रश्न पूछवाया। जब हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) इसका उत्तर नहीं दे सके, तो उस व्यक्ति ने तंज़ करते हुए कहा कि "शहर के इतने बड़े धार्मिक और विद्वान परिवार में रहते हुए तुम्हें यह मसला नहीं पता?"
इस बात से हज़रत मौलाना अहमद अली मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) के दिल पर गहरी चोट लगी और उन्हें अपने जीवन के 18 साल बिल्कुल व्यर्थ चले जाने का एहसास हुआ। इसके बाद उन्होंने खेल और कबूतरबाजी छोड़कर ज्ञान प्राप्त करने का संकल्प लिया। सबसे पहले, वे मेरठ गए, जहाँ उन्होंने कुरआन हिफ्ज़ के साथ-साथ प्रारंभिक फारसी की शिक्षा प्राप्त की। मेरठ के बाद वे सहारनपुर आए और हज़रत मौलाना सआदत अली फकीह सहारनपुरी (रह.) से अरबी की प्रारंभिक कृतियाँ पढ़ीं। इसके बाद हज़रत मौलाना मुफ़्ती इलाही बख्श (रह.) के पास कांधला गए और उनसे शिक्षा हासिल की। वहाँ अधिक समय नहीं गुजरा था कि मुफ़्ती इलाही बख्श का निधन हो गया।
सच्चे ज्ञान की प्यास और तड़प ने उन्हें दिल्ली खींच लिया, जहाँ हज़रत मौलाना ममलूक-अल-अली (रह.) की शिक्षण सभा चल रही थी और दुनिया के बड़े-बड़े विद्वान भी अध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) ने भी हज़रत मौलाना ममलूक-अल-अली (रह.) के दरिया-ए-इल्म में गोता लगाना शुरू कर दिया। वे एक लंबे समय तक हज़रत मौलाना ममलूक-अल-अली (रह.) के दरबार में शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त करते रहे। इसी दौरान, सैयद-अल-ताएफा हज़रत हाजी इमदादुल्लाह महाजिर मक्की (रह.) भी हज़रत मौलाना ममलूक-अल-अली (रह.) से शिक्षा प्राप्त करने आए। मौलाना ममलूक-अल-अली (रह.) ने अन्य किताबें खुद पढ़ाईं, लेकिन गुलिस्तान सादी का पाठ हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) को सौंपी।
हज़रत मौलाना अहमद अली (रह.) ने बुखारी शरीफ का अधिकांश हिस्सा अपने ताया हज़रत मौलाना शाह वजीहुद्दीन मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) से पढ़ा। मौलाना वजीहुद्दीन (रह.) को फिकह, तफसीर और हदीस आदि में बहुत उच्च स्तर की महारत थी। आपके फतवे समकालीन विद्वानों की नजर में मान्यता प्राप्त और विश्वसनीय थे। हज़रत शाह मोहम्मद इसहाक देहलवी (रह.) आपके फतवे को विशेष महत्व देते थे। आपके शिक्षकों में हज़रत मुफ़्ती इलाही बख्श कांधलवी (रह.) भी थे।
दिल्ली के प्रवास के दौरान, हज़रत मौलाना शाह मोहम्मद इस्हाक़ मुहद्दिस देहलवी (रह.) मक्का मुकर्रमा हिजरत कर गए, जिसकी वजह से उनसे लाभान्वित होने का अवसर नहीं मिल सका। इसका हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) को गहरा एहसास और दुख था। इसलिए, अपने उस्ताद हज़रत मौलाना ममलूक-अल-अली (रह.) के साथ मक्का मुकर्रमा गए और वहाँ हज़रत शाह (रह.) के पास एक साल से अधिक समय रहकर सिह्हा सित्ताह (छह प्रमुख हदीस की किताब) का अध्ययन किया और इसी दौरान हज की भी सआदत प्राप्त की। मक्का में, हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) का यह मामूल था कि फजर से लेकर जुहर तक हदीस की किताबों को नक़ल करते थे और जुहर के बाद हज़रत शाह (रह.) की शिक्षण सभा में शामिल होते थे। इसी सभा में उन्होंने सिह्हा सित्ताह को पूरा किया।

उच्च शिक्षा

1261 हिजरी में शिक्षा पूरी करने के बाद, हज़रत शाह (रह.) से हदीस शरीफ की सेवा की सनद (शैक्षिक प्रमाण पत्र) और अनुमति प्राप्त हुई। फिर वहाँ से हिंदुस्तान लौटकर दिल्ली में क़ियाम फरमाया और हदीस नबवी की तालीम के साथ-साथ हदीस की उच्च पुस्तकों बुखारी, मुस्लिम, तिरमिजी, अबू दाऊद, मिश्कात-अल-मसाबिह आदि की तसहीह (शुद्धिकरण), हवाशी (टिप्पणियां) और तालीक (शुद्धियां) की तरफ़ तवज्जोह दी। इन किताबों की तसहीह के लिए उन्होंने एक प्रिंटिंग प्रेस खरीदा जो "मतबए अहमदी" के नाम से मशहूर हुआ। इस प्रेस ने हदीस की बे-मिसाल और अविस्मरणीय सेवाएं अंजाम दीं।

खिदमत-ए-हदीस शरीफ

हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) की जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण, प्रमुख और उच्च कार्य यह है कि उन्होंने वह काम अंजाम दिया जो सदियों से उम्मत-ए-मुस्लिमा पर कर्ज़ था। उन्होंने हदीस की किताबों का बहुत मेहनत, मशक्क़त, बारीकी, ध्यान और अत्यधिक एहतियात से ना सिर्फ़ सुधार किया बल्कि उनकी तालीक, उम्दा हवाशी और बे-मिसाल बैनुस सुतूर (किसी गहरे या छिपे हुए अर्थ को व्यक्त करने के लिए पंक्तियों के बीच इस्तेमाल होने वाले शब्द) लिखे।
- बुखारी शरीफ: उन्होंने बुखारी शरीफ पर बहुत ही विद्वत्तापूर्ण, शोधपूर्ण और आलोचनात्मक हाशिये लिखे और उनकी गल्तियों की सही किया।
- मुस्लिम शरीफ: मुस्लिम शरीफ की गलतियों को सही करने के बाद, भारत में सबसे पहली बार इसे शरह नववी के साथ प्रकाशित किया।
- अबू दाऊद शरीफ: अबू दाऊद शरीफ की तसहीह के दौरान कई पुराने नुस्खों को सामने रखा।
- अन्य पुस्तकें: अन्य पुस्तकों की तसहीह और हवाशी भी बेहतरीन तरीके से लिखी।
उन्होंने लगभग दस साल से अधिक समय बुखारी शरीफ की सेवा में बिताया। जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई, तो बड़े-बड़े विद्वानों ने उनकी मेहनत की तारीफ की। हर तरफ़ से उनकी इस सेवा को बहुत सराहा गया और उनकी इस सेवा को आम और खास ने इतना सराहा कि जहां भी नबी की तालीम होती है, वहां हज़रत मौलाना अहमद अली (रह.) के नबवी इल्म की तारीफ होती है।

प्रेस जब्त हो गया

हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) ने रमज़ान 1273 हिजरी (1857 ईस्वी) तक दिल्ली में हदीस की बे-मिसाल शिक्षा और ज्ञान की सेवा जारी रखी। लेकिन 1857 के खूनी फसाद ने पूरे हिंदुस्तान और विशेष रूप से दिल्ली को तहस-नहस कर दिया था। दिल्ली के मुसलमानों पर जो अत्याचार और जुल्म के पहाड़ टूटे, वह इतिहास का सबसे काला अध्याय है। मुसलमानों का जन संहार किया गया। हजारों निर्दोषों को सूअर की खालों में भरकर जला दिया गया। चौवन हजार उलेमा को फांसी पर लटका दिया गया। तीन लाख कुरआन के नुस्खे जलाकर यमुना में बहा दिए गए। हजारों जिंदा लोगों को बांधकर नदी में फेंक दिया गया। मासूम माताओं, बहनों और पवित्र बेटियों को गोरों ने अपनी हवस का शिकार बनाया और फिर उन्हें गोलियों से भून दिया। सैकड़ों महिलाओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए कुओं और नदियों में कूदकर जान दे दी। कई कुएं मासूम लड़कियों की लाशों से भर गए थे। आम मुसलमानों की संपत्तियों और जायदादों को हड़पने के साथ-साथ उनके घरों को भी जला दिया गया।
दिल्ली मुसलमानों के लिए मक्तल बन चुकी थी। ऐसे हालात में मुसलमान अपनी जान बचाकर दिल्ली से हिजरत कर रहे थे। हज़रत मौलाना अहमद अली (रह.) मुहद्दिस सहारनपुरी भी बड़ी मुश्किल से दिल्ली से हिजरत करने पर मजबूर हो गए। आपका ऐतिहासिक प्रेस गोरों के जुल्म का शिकार हो गया। इसलिए, आप दिल्ली से सहारनपुर आ गए और डेढ़ दो साल तक हदीस की सेवा और शिक्षा देने में मशगूल रहे। फिर मेरठ के मशहूर रईस शेख इलाही बख्श (रह.) लाल कुर्ती के यहां पांच सौ रुपये माहवार की नौकरी स्वीकार कर ली।
रईस साहिब बहुत बड़े व्यापारी थे। पेशावर से कलकत्ता तक सभी चौकियों में सामान पहुंचाने का ठेका उन्हीं के पास था। इसलिए, कलकत्ता और आसपास के क्षेत्रों में रईस साहिब ने हज़रत मौलाना अहमद अली (रह.) को नियुक्त किया। इसी सिलसिले में, उन्होंने लगभग 9-10 साल तक कलकत्ता में क़याम किया। वहां भी हदीस की तालीम का सिलसिला चलता रहा और हदीस के शौकीनों को फ़ैज़ मिलता रहा।
इसी दौरान, आप हज के लिए गए। वहां उलमा-ए-देवबंद के रूहानी पेशवा, सय्यिदुत्तईफ़हहज़रत हाजी इमदादुल्लाह महाजिर मक्की थानवी (रह.) निवास कर रहे थे। उनसे मुलाकात हुई, तो हाजी साहिब ने फरमाया कि मौलाना ममलूक-अल-अली ने गुलिस्तान का सबक़ आपको सौंपा था, इस नाते आप मेरे उस्ताद हैं। लेकिन एक बात आपसे कहूंगा कि आपने जो रईस साहिब की नौकरी स्वीकार की है, यह अच्छा नहीं लगता। आप साहिब-ए-इल्म हैं, चाहिए तो यह था कि आप हाकिम होते और वे मातहत होते, जबकि यहां मामला उलट है। इसलिए आप नौकरी छोड़कर हदीस नबवी की तालीम और खिदमत में लग जाएं ताकि लोगों को फ़ैज़ मिले। मौलाना ने इसे स्वीकार कर लिया और फरमाया कि आप हमारे लिए हरम शरीफ में दुआ फरमाएं।

(शमाइम इमदादिया)

नौकरी से इस्तीफा

हज के बाद, आप हिंदुस्तान लौटे और रईस साहिब की नौकरी से इस्तीफा देकर सहारनपुर आए। वहां कुछ समय तक अपने निवास पर शिक्षा और तालीम का सिलसिला जारी रखा। यह मज़ाहिर उलूम के लिए बड़ी सौभाग्य और खुशी की बात थी। मज़ाहिर उलूम की पुरानी रिपोर्ट में कई जगह इस खुशी और हर्ष का बड़े स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया गया। 1291 हिजरी की रिपोर्ट में लेखक लिखते हैं: "विद्यार्थियों और धार्मिक ज्ञान के प्रेमियों के लिए खुशखबरी है कि इस वर्ष मौलवी अहमद अली (रह.) ने कलकत्ता से संबंध तोड़कर सहारनपुर में निवास करना प्रारंभ किया है। मुख्य उद्देश्य यही है कि जितना संभव हो सके, धार्मिक ज्ञान के शिक्षण में अपना समय व्यतीत करें।"

साक़िया! याँ लग रहा है चल-चलाव
"जब तलक बस चल सके सागर चले"

इस प्रकार, हदीस के छात्र दूर-दूर से यह खुशखबरी सुनकर इकट्ठा हो गए और कुछ मज़ाहिर उलूम के छात्र भी उनसे पढ़ते हैं। अधिकांश दिन शिक्षण और अध्ययन में बिताते हैं बल्कि रात को भी कुछ छात्र पढ़ते हैं और उनके सहारनपुर के निवास से छात्रों को पुस्तकों में भी बहुत मदद मिलती है। अपने निवास पर लगभग एक साल तक हदीस की शिक्षा देते रहे। फिर जब 1291 हिजरी से 1292 हिजरी तक मज़ाहिर उलूम की नियमित इमारत (मदरसा कदीम) पूरी हुई, तो आप उस इमारत में स्थानांतरित हो गए और जीवन भर मज़ाहिर उलूम में शिक्षा देते रहे। मज़ाहिर उलूम में आपकी इच्छा और तमन्ना के अनुसार एक विशेष कक्ष निर्धारित किया गया जहाँ आप छात्रों पर ज्ञान की बारिश करते थे।
आपने अपनी पुस्तकें भी उसी कक्ष में रखीं ताकि ज्ञान के इच्छुक अधिक से अधिक लाभ उठा सकें।इस ध्यान और असीम कृपा के बावजूद आपने पूरी जिंदगी मज़ाहिर उलूम की बिना किसी स्वार्थ के सेवा की। मज़ाहिर उलूम की रिपोर्ट में लिखा है:
"الحمد للہ علی احسانہ” अल्लाह का शुक्र है उसके अहसान पर कि इस मदरसे की हालत पर खुदावंद ने कितना बड़ा करम किया और इसकी बेबसी पर रहम खाकर ऐसा शिक्षक बिना तनख्वाह अता किया कि दो सौ रुपये माहवार खर्च करके अगर हम मदरसे के लिए ऐसा शिक्षक चाहते तो हरगिज़ मयस्सर न होता।
चश्मे बद दूर, गोया इल्म का सूरज बानी रूह सआदत (रहमतुल्लाह अलैह) पर चमक रहा है और आअ़ज़म समाअ रफअत (आकाश की ऊँचाई की महानता) इसी मदरसे पर चमक रही हैं।

''شکر نعمت ہائے تو چندانکہ نعمت ہائے تو''
खुदावंद जितना बड़ा तूने इनाम फरमाया है, उतनी ही उसके शुक्र की तौफीक अता फरमा।

हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) मज़ाहिर उलूम में शिक्षा देने के साथ-साथ अपने निवास पर भी कई छात्रों को शिक्षा देते रहे और उनके खान-पान का भी खुद ही इंतज़ाम करते थे। मदरसे का नाम "मज़ाहिर उलूम" आप ही ने सुझाया था। 1291 हिजरी से पहले की सभी रिपोर्टें "अरबी मदरसा" के नाम से छपीं। 1292 हिजरी से "मदरसा कदीम" की इमारत की समाप्ति का साल भी सामने आता है और इसके सदरुल मुदर्रिसीन (प्रमुख शिक्षक) हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानोतवी (रह.) के नाम की ओर भी इशारा है।
मौलाना अहमद अली साहिब (रह.) की शिक्षा का यह हाल था कि फजर से लेकर इशा तक छात्रों की भीड़ लगी रहती थी, यहां तक कि जब वे घर से मदरसे जाते थे, तो रास्ते में भी छात्रों को पढ़ाते जाते थे यही नहीं बलके अस्र के बाद जब मौलाना तफरीह (मनोरंजन) के लिए घोड़े पर सवार होते थे, तब भी हदीस के शौकीन उनके साथ दौड़ते और उनसे ज्ञान प्राप्त करते थे।
मज़ाहिर उलूम में छात्रों को जिस मेहनत, लगन और सच्चाई से हज़रत मुहद्दिस (रह.) ने शिक्षा दी, उसने दूर-दूर तक 'मज़ाहिर उलूम' की ख्याति फैला दी। इसके शिक्षा और प्रशिक्षण की प्रणाली को आम और खास लोगों ने खूब सराहा, और अल्हम्दुलिल्लाह, मज़ाहिर उलूम अब भी अकाबिर (बड़े बुजुर्ग) के नक्श-ए-कदम और उनकी परंपराओं पर चलने में गर्व महसूस करता है।
आपकी अटूट मेहनत और प्रयासों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मज़ाहिर उलूम में जिन किताबों को पढ़ाया जा रहा था, उनमें से कई किताबों को आपने दो-दो बार पढ़ाया। इसकी पूरी जानकारी मज़ाहिर उलूम की रिपोर्ट (1291 हिजरी से 1297 हिजरी) में मिल सकती है।
फखरुल अमसिल हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानोतवी (रह.) जब 1294 हिजरी में हज-ए-बैतुल्लाह के लिए गए, तो हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) ने उनके अध्यक्षता के सभी कार्यों को बेहतरीन तरीके से अंजाम दिया। उनसे संबंधित किताबों की तालीम दी और उनके अन्य कार्यों को भी पूरा किया।
1286 हिजरी में जब आपके उस्ताद, फकीहुल अस्र हज़रत मौलाना मुफ़्ती सआदत अली साहिब (रह.) का इंतकाल हुआ, तो सर्वसम्मति से हज़रत काज़ी फ़ज़लुर्रहमान साहिब (रह.) को प्रधानाध्यापक नियुक्त किया गया। मदरसे के नेताओं और बड़ों ने हज़रत मुहद्दिस (रह.) को, चूंकि उप-प्रधानाध्यापक का पद खाली था, यह पद सोंपा और आप ने इस पद पर सारे कार्य सफलतापूर्वक अंजाम दिए। फिर थोड़े ही समय बाद, 1291 हिजरी में मज़ाहिर उलूम की आम सभा में सर्वसम्मति से आपको मदरसे का प्रधानाध्यापक नामित किया गया और उस साल 1291 हिजरी की रिपोर्ट में प्रधानाध्यापक के स्थान पर आपका नाम प्रकाशित हुआ। हकीकत यह है कि मौलाना अहमद अली साहिब (रह.) मुहद्दिस सहारनपुरी के आने से मज़ाहिर उलूम को बहुत अधिक तरक्की मिली, शैक्षिक स्तर ऊँचा हुआ, आर्थिक स्थिरता प्राप्त हुई, दूर-दूर तक इसकी ख्याति फैली और इसे स्वीकारता मिली। वित्तीय सहायता के लिए आपने कई बार यात्रा की। उदाहरण के लिए, मदरसा कदीम (जो मज़ाहिर उलूम की सबसे पहली इमारत है) के कार्यालय के लिए आपने दस हजार रुपये की बड़ी रकम जुटाकर मदरसे में जमा की।
आप उच्च नैतिकता, नम्रता, शफकत, कोमलता, और दानशीलता में अद्वितीय थे। आप हर दिन नए कपड़े पहनते थे और पहने हुए कपड़े गरीबों में बाँट देते थे। आपकी इन उत्कृष्ट विशेषताओं के कारण हर व्यक्ति आपका प्रशंसक था। आपका जोहद, इबादत, और इख्लास बहुत उज्ज्वल था। आपके तक़वा और तौहरत के कई वाक्यात मशहूर हैं, जिनका उल्लेख मज़ाहिर उलूम की रिपोर्टों, तारीख़ मज़ाहिर उलूम, और हज़रत शैखुलहदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया मुहाजिर मदनी (रह.) की आत्मकथा आदि में मिलता है।
एक बार आप वित्तीय सहायता के लिए कलकत्ता गए। वहाँ एक ऐसी जगह गए जहाँ आपका कोई जानने वाला था, वहाँ भी अच्छी खासा चंदा हुआ। लेकिन जब आप मदरसे में आय और खर्च का हिसाब पेश किया, तो एक जगह लिखा था कि "कलकत्ता में फुलाँ जगह से फुलाँ जगह तक का किराया न लिखा जाए क्योंकि वहाँ मुझे एक दोस्त से मिलना था, चंदे की नीयत नहीं थी, यद्यपि काफी चंदा हुआ।"
इसी तरह, एक बार आप बनारस में वाली-ए-टोंक से मिलने गए। यात्रा खर्च के हिसाब में सहारनपुर से कानपुर तक का किराया नहीं लिखा। कारण यह था कि कानपुर में एक साहब से व्यक्तिगत मुलाकात की थी। मदरसे के लोगों ने किराया देने की कोशिश की, लेकिन आपने वापस कर दिया।
इन दो घटनाओं से ही आपकी परहेज़गार जिंदगी की झलक नज़र आती है। आप फरिश्ता सिफत इंसान थे। जब तक जीवित रहे, छात्रों और मदरसे पर अपनी संपत्ति खर्च करते रहे। शिक्षा के बावजूद हर साल दो-तीन सौ रुपये अपनी जेब से मदरसे को दान देते थे। हर साल अद्वितीय धार्मिक पुस्तकों से भी मज़ाहिर उलूम को नवाज़ते रहते थे और छात्रों की परीक्षा भी बड़े सतर्कता से लेते थे। सफल छात्रों को नकद राशि के अलावा पुस्तकों के रूप में इनाम भी देते थे। सफल छात्रों को बुखारी शरीफ के 26 और तिरमिज़ी शरीफ के 6 नुस्खे अता फरमाए।
हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) के कारण फकीहुल इस्लाम हज़रत मौलाना सआदत अली (रह.) का धार्मिक परिवार बहुत व्यापक हुआ, जिसकी विस्तृत जानकारी "शजरह-ए-सआदत" में मिलती है।
हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) को दारुल उलूम देवबंद से भी बहुत मुहब्बत और अपनापन था, जिसे आपके प्रिय शिष्य हज़रत मौलाना मोहम्मद कासिम नानोतवी (रह.) ने 15 मुहर्रम 1283 हिजरी को स्थापित किया था। दारुल उलूम देवबंद की पहली इमारत "नौरदा" की बुनियाद के वक्त सबसे पहला पत्थर हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) ने अपने हाथों से रखा।
उसके बाद हज़रत मौलाना मोहम्मद कासिम नानोतवी (रह.), हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही (रह.), हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानोतवी (रह.) ने एक-एक ईंट रखी। दारुल उलूम देवबंद के बड़े विद्वानों की राय थी कि शुरू में दारुल उलूम को कच्चे मकान की तरह बनाया जाए। लेकिन हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) ने अपनी ईमानी बुद्धिमानी और दूरदर्शिता के कारण कहा कि दारुल उलूम पक्का बनाया जाए फिर उसी पर अमल हुआ।
हकीकत यह है कि हज़रत मुहद्दिस (रह.) ने अपनी जिंदगी के अधिकांश समय को धार्मिक सेवाओं में व्यतीत किया। जैसे शिक्षा और तालीम से लेकर इस्लामी मदरसों की सहायता, बड़े विद्वानों और पूर्वजों के स्वागत, धार्मिक ज्ञान के छात्रों के निवास और भोजन की व्यवस्था, समाज सुधार के लिए दूर-दराज के सफर और धार्मिक शिक्षा, बिदअतों (इस्लाम मैं ऐसी नई चीज़ें मिलाना जो इस्लाम मैं नहीं हैं) और रस्मों (रिवाजों) की जड़ें उखाड़ना, और बड़े विद्वानों और पूर्वजों की स्वर्ण परंपराओं की रक्षा करना।
आपके प्रमुख शिष्यों की संख्या इतनी अधिक है कि यदि उन सभी के केवल नाम ही यहाँ लिखे जाएं, तो पत्रिका के कई पृष्ठ भर जाएंगे। हालांकि, कुछ प्रमुख शिष्य जो अपने समय के युगान्तर और धार्मिक ज्ञान के महासागर थे, ये हैं:
- देवबंद के रूहानी पेशवा सय्यिदुत्तईफ़ह हज़रत हाजी इमदादुल्लाह महाजिर मक्की (रह.)
- इमाम रब्बानी हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोहवी (रह.)
- हुज्जत-उल-इस्लाम हज़रत मौलाना कासिम नानोतवी (रह.)
- मुहद्दिस कबीर हज़रत मौलाना अहमद हसन अमरोही (रह.)
- फखरुल अमसिल हज़रत मौलाना मज़हर नानोतवी (रह.)
- ज़ुब्दातुल उलमा हज़रत मौलाना मोहम्मद याकूब नानोतवी (रह.)
- हज़रत मौलाना मोहम्मद अहसन नानोतवी (रह.)
- हज़रत मौलाना अब्दुल्लाह अंसारी अन्बेहटवी (रह.)
- हज़रत मौलाना अब्दुल अली मेरठी (रह.)
- मुनाज़िर-ए-इस्लाम हज़रत मौलाना मोहम्मद अली मोंगीरी (रह.) (बानी नदवतुल उलेमा लखनऊ)
- अदीब-ए-दौरां हज़रत अल्लामा शिबली नोमानी (रह.)
- हज़रत मौलाना मुफ़्ती अब्दुल्लाह टोंकी (रह.)
- हज़रत मौलाना मोहम्मद सुलेमान फुलवारी (रह.)
- हज़रत मौलाना सैयद तजम्मुल हुसैन बिहारी (रह.)
1297 हिजरी की शुरुआत में, हज़रत मौलाना मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) पक्षाघात के शिकार हो गए। सिरदर्द और बुखार भी तेज हो गया। इयादत (बीमार को देखने जाना ) के लिए हुज्जतुल-इस्लाम हज़रत मौलाना मोहम्मद कासिम नानोतवी (रह.) दस-बारह दिनों के लिए सहारनपुर आए, फिर वापस देवबंद चले गए। लेकिन हज़रत मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) की बीमारी में सुधार के बजाय गिरावट आती गई।
फिर, इसी बीमारी में, 6 जमादिल-अव्वल 1297 हिजरी, 17 अप्रैल 1880 ईस्वी को शनिवार के दिन, लगभग 72 साल की उम्र में उन्होंने अन्तिम सांस ली।

इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलैहि राजिऊन।

आपको आपके पैतृक कब्रिस्तान, ईदगाह, सहारनपुर में दफन किया गया।
हज़रत मौलाना इनामुर्रहमान थानवी ने "अरमुगान-ए-तखय्युल" में निम्नलिखित तारीख़-ए-वफ़ात लिखी है।

حضرت الحاج مولانا سعادت علی ارجمند ٭ داشت بہرنشرعلم دیں چہ طبع دردمند
مولانا حاج حضرت احمد علی محدث ٭ سرخیل عالمانہ وشیخ الحدیث امجد
بودہ پئے مظاہرآں ذات چوں مؤسس ٭ اوہم باتدائش کارش نمود بیحد
درہندبارِاول باحسنِ حواشی ٭ کردہ حدیث طبع ازحق چوں شدمؤید
استاذ کل بدوراں آں مرجع افاضل ٭ چوں انتقال کردہ گردید زیب مرقد
انعامؔ بہر امرو فرمائش احباء ٭ سال عیسوی فوتش گفت از حساب ابجد
مولانا پاک جبہ احمد علی محدث ٭ درجلوۂ جناں شدازلطفِ ربِ اوحد
۸۷۶ ٭ ۱۰۰۴