संस्थापक (बानियान-ए-किराम)

हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रहमतुल्लाह अलैह)

खानदान-ए-शेख लुत्फ अली के चश्म-ओ-चराग़, चमनिस्तान-ए-शाह इसहाक़ मुहद्दिस देहलवी (1176 हिजरी-1262 हिजरी) के गुल सरसैय्य्द हजरत मुफ्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दः (1204 हिजरी-1295 हिजरी) के शागिर्दे-रशीद, उस्ताद-ए-कुल हजरत मौलाना ममलूकुलअली साहिब नानौतवी (वफ़ात 1267 हिजरी) के मंजूर-ए-नज़र, गंभीरता और संजीदगी के प्यारे पुतले, इल्म-ओ-फज़ल में बेमिसाल, हदीस-ओ-तफ़सीर, फ़िक़ह-ओ-फ़तावा, मंतिक-ओ-फ़लसफ़ा और फ़साहत-ओ-बलाग़त के जानकार, तहक़ीक़-ओ-तजस्सुस में बेहतरीन, बारीक मसलों की समझ और समाधान में बेमिसाल, आलिम बा अमल, फाज़िल-ए-अफ़ज़ल, मुहद्दिस-ए-अफ्ज़ल, तक़वा-ओ-तहारत, ज़ुहद-ओ-क़नाअत, सलूक-ओ-तरीक़त, इबादत-ओ-रियाज़त, खुलूस-ओ-लिल्लाहियत, इस्तग़ना-ओ-बेनियाज़ी और मुख्तलिफ़ सिफ़ात-ए-महमूदा और कमालात-ए-हसना के मजहर, औक़ात-ओ-मामूलात के पाबंद, तकल्लुफ़ और दिखावे से दूर, सादगी पसंद, सादा तबीयत, फक़ीह-ए-असर हजरत मौलाना सआदत अली फक़ीह सहारनपुरी (रहमतुल्लाह अलैह) के फ़िदाई, इमाम रब्बानी हजरत मौलाना रशीद अहमद गंगोही (रहमतुल्लाह अलैह) के शैदाई, मज़ाहिर उलूम सहारनपुर के पहले प्रधानाचार्य, फ़ख़रुल-अमासिल, ज़ुब्दतुल-अफाज़िल हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर हुसैन (रहमतुल्लाह अलैह) अपने वतन नानौतह में 1237 हिजरी-मुताबिक 1821 ईस्वी को पैदा हुए।

नाम और नसब (वंशावली)

आपका तारीखी नाम मोहम्मद मज़हर है और इसी से आप प्रसिद्ध हुए। आप सिद्दीक़ी खानदान के चश्म-ओ-चराग़ थे। आपका नसब इस प्रकार है:
हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर बिन जनाब हाफिज़ लुत्फ़ अली बिन हाफिज़ मोहम्मद हसन बिन हकीम ग़ुलाम अशरफ बिन हकीम अब्दुल्लाह बिन शेख अबुल फ़तह मोहम्मद मुफ़्ती बिन मौलवी मोहम्मद हाशिम बिन शाह मोहम्मद बिन क़ाज़ी ताहा बिन मुफ़्ती मुबारक बिन क़ाज़ी अमान बिन क़ाज़ी जमालुद्दीन बिन क़ाज़ी मीरां बुढ़े बिन क़ाज़ी मज़हरुद्दीन बिन नज्मुद्दीन बिन नूरुद्दीन बिन क़यामुद्दीन बिन ज़ियाउद्दीन बिन नूरुद्दीन बिन नज्मुद्दीन बिन नूरुद्दीन बिन रुक्नुद्दीन बिन रफ़ीउद्दीन बिन बहाउद्दीन बिन शिहाबुद्दीन बिन ख़्वाजा यूसुफ़ बिन ख़लील बिन सदरुद्दीन बिन रुक्नुद्दीन समरक़ंदी बिन सदरुद्दीन अल-हाज बिन इस्माइल अश-शहीद बिन नूरुद्दीन अल-क़ातिल बिन महमूद बिन बहाउद्दीन बिन अब्दुल्लाह बिन ज़करिया बिन नूर बिन सिराज बिन शादि अस-सिद्दीक़ी बिन वहीदुद्दीन बिन मसूद बिन अब्दुर रज़्ज़ाक़ बिन क़ासिम बिन मोहम्मद (रज़ियल्लाहु अन्हु) बिन अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु).

(नसब नामः शोख नानौतह, पृष्ठ 5, और मकतूबात मौलाना मोहम्मद याक़ूब)

शिक्षा और प्रशिक्षण

क़ुरान करीम को हिफ़्ज़ (कंठस्थ) और प्रारंभिक किताबों की पूरी शिक्षा अपने पिता, हजरत हाफिज़ लुत्फ़ अली साहिब (रह.) से प्राप्त की। अपनी मानसिक योग्यता और उत्कृष्ट शिक्षा-दीक्षा के कारण आप बचपन में ही बहुत होशियार थे और आपके उस समय के तौर-तरीकों से आपकी बुद्धिमत्ता जाहिर होती थी। वतन की प्रारंभिक शिक्षा के बाद उस्ताद-ए-कुल हजरत मौलाना मम्लूकुल अली साहिब नानौतवी आपको अपने साथ दिल्ली ले गए। उत्सदुल्कुल की बेहतरीन शिक्षा-दीक्षा और वहाँ के खालिस माहौल ने बड़ा काम किया। उस समय आपके दोस्तों और मौलाना मम्लूकुल अली साहिब की मजलिस में आपकी योग्यता और क्षमता का चर्चा होने लगा था।
मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक जनाब सर सैयद अहमद ख़ान (1817-1898 ई.) लिखते हैं: "मौलवी साहिब बड़े विद्वान थे। जिस समय वे दिल्ली में विद्यार्थी थे, उसी समय उनकी बुद्धिमत्ता मशहूर थी। वे तक़वा और वरा (धार्मिकता) में भी उच्च स्तर रखते थे।"
दिल्ली में हजरत मौलाना मम्लूकुल अली साहिब नानौतवी के अलावा, सदरुस्सुदूर हजरत मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा देहलवी, हजरत मौलाना रशीदुद्दीन ख़ान साहिब देहलवी (1834 ई.) से भी उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया।
हदीस शरीफ़ की शिक्षा हजरत शाह अब्दुल गनी मुजद्दिदी (1820-1879 मदीना), मुहद्दिस-ए-कबीर हजरत मौलाना अहमद अली साहिब मुहद्दिस सहारनपुरी (1810-1880) से पढ़ने का सम्मान प्राप्त किया।
इन विद्वानों के अलावा, मदरसा सोलतिया मक्का के संस्थापक, मुनाज़िर-ए-इस्लाम हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहिब किरानवी और मदीना मुनव्वरा के महान विद्वान हजरत शेख अब्दुल गनी बिन सईद अलउमरी से भी आपने ज्ञान प्राप्त किया, जिसका तफ्सीली ज़िक्र "हज-ए-बैतुल्लाह" के अंतर्गत आएगा।

मुलाज़मत

शिक्षा पूरी करने के बाद आप अजमेरी कॉलेज गए और कुछ समय तक वहाँ शिक्षा देने के बाद आगरा कॉलेज गए। वहाँ आपको उच्च वेतन और पद प्रदान किया गया, लेकिन वहाँ भी आप ज़्यादा समय तक नहीं रहे। इसके बाद आप कुछ समय के लिए दिल्ली में भी नौकरी पर रहे और थोड़े समय बाद मक्तबा नवल किशोर लखनऊ (जो धार्मिक, सुधारात्मक, और दर्स-ए-निज़ामी के अलावा नादिर और नायाब किताबों की उच्च लेखन और प्रकाशन में प्रसिद्ध था) चले गए और वहाँ अरबी, उर्दू और फारसी की किताबों की सुधार आदि करते रहे।
इसके साथ ही, कई छात्रों ने आपसे फ़िक़ह, उसूल फ़िक़ह और इल्म-ए-कलाम की किताबें पढ़ने का सम्मान प्राप्त किया। एक लम्बे समय तक आप इसी काम में लगे रहे। आपकी लिखी और संपादित किताबों की प्रकाशन और प्रसार का सिलसिला भी चलता रहा। कई लेखकों की किताबें आपकी सुधार और समीक्षा के बाद ही मक्तबा नवल किशोर लखनऊ से छपती थीं। खुद मुंशी नवल किशोर भी मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब नानौतवी के शिष्य थे।
आदरणीय शिक्षक हजरत मौलाना अतहर हुसैन (रह.) ने फरमाया कि मुंशी नवल किशोर मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब नानौतवी की उत्कृष्ट संगति और बेहतरीन शिक्षा के कारण उनके बड़े प्रशंसक और अनुयायी थे। मौलाना का बहुत आदर और सम्मान करते थे। आपकी संगति का ही परिणाम था कि मुंशी नवल किशोर बेहतरीन दाढ़ी, शानदार कुर्ता-पायजामा और उत्तम पगड़ी का इस्तेमाल करते थे।

तहरीके आजादी (स्वतंत्रता संग्राम)

1857 के दौरान अकाबिर उलमा-ए-देवबंद अंग्रेजी अत्याचार से छुटकारा पाने और उनसे लड़ाई की तैयारियाँ कर रहे थे। इसी समय थाना भवन के मशहूर क़ाज़ी इनायत अली के छोटे भाई अब्दुर्रहीम साहिब हाथी खरीदने के लिए सहारनपुर आए। किसी दुश्मन ने सरकार को गलत खबर दी कि क़ाज़ी अब्दुर्रहीम दिल्ली मदद भेजने के लिए हाथी खरीदने के लिए सहारनपुर आए हैं। अंग्रेज़ पहले से ही डरे हुए थे। उस समय के कलेक्टर का नाम स्पेंकी था। उसने मामले की तहकीकात करने के बजाय मुसलमानों को डराने के लिए क़ाज़ी अब्दुर्रहीम और उनके साथियों को गिरफ्तार कर फांसी दे दी।
इस दुखद खबर से सहारनपुर के आसपास के इलाकों में प्रतिशोध की भावना भड़क उठी। सय्यादुत्तईफाह हज़रत हाजी इमदादुल्लाह साहिब मुहाजिर मक्की (रह.), हज़रत ज़ामिन शहीद (रह.), हज़रत मौलाना शेख़ मोहम्मद थानवी (रह.), हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.), हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही (रह.), हज़रत मौलाना मोहम्मद क़ासिम नानौतवी (रह.), हज़रत मौलाना मोहम्मद अहसन नानौतवी (रह.), हज़रत मौलाना मोहम्मद मुनीर नानौतवी (रह.) और क़ाज़ी इनायत अली आदि ने एक सभा आयोजित की।
इस सभा में मौलाना शेख़ मोहम्मद थानवी (रह.) ने जिहाद के खिलाफ राय दी और फरमाया:
"जब क़ाज़ी इनायत अली साहिब आम युद्ध के दौरान खामोश रहे और उपस्थित सदस्यों में से भी किसी ने इसे जिहाद समझकर हिस्सा नहीं लिया, तो इस समय जब प्रतिशोध की भावना सक्रिय है, इस लड़ाई को जिहाद कैसे कहा जा सकता है?"
हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) के छोटे भाई, हज़रत मौलाना मोहम्मद अहसन नानौतवी (रह.) ने भी हज़रत मौलाना शेख़ मोहम्मद थानवी (रह.) की राय का समर्थन किया। इस पर उनके बड़े भाई, मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.), जो मज़ाहिर उलूम सहारनपुर के प्रधानाचार्य थे, ने उन्हें डांटा।
बहरहाल, सलाह-मशवरे के बाद तय हुआ कि अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद किया जाए और शामली का मैदान इसके लिए निर्धारित किया गया। सय्यिदुत्तईफा हज़रत हाजी इमदादुल्लाह साहिब थानवी मुहाजिर मक्की (रह.) को अमीर-उल-मोमिनीन, हज़रत हाफिज़ ज़ामिन शहीद (रह.) को जिहाद के सबसे बड़े अलमबरदार, हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही (रह.) को जमाअत-ए-मुजाहिदीन और हज़रत मौलाना मोहम्मद क़ासिम नानौतवी (रह.) को अमीर-ए-लश्कर नियुक्त किया गया।
मुट्ठीभर यह निहत्था दल, जिनके इरादों में शाहीन का हौसला और पहाड़ों की मजबूती थी, शामली के मैदान में अंग्रेजी सेना से भिड़ गया। इन महान विद्वानों ने, जिनके कोमल हाथों ने केवल किताबों को छुआ था, ने समय आने पर अपनी वीरता और जुझारूपन से दुनिया को हैरत में डाल दिया। हज़रत मौलाना मोहम्मद क़ासिम नानौतवी (रह.) की बहादुरी को देखकर हज़रत हाजी साहिब ने मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब के सबसे छोटे भाई हज़रत मौलाना मोहम्मद मुनीर नानौतवी (रह.) से फरमाया:
"मौलाना मोहम्मद क़ासिम पूरी तरह से आज़ाद और बहादुर हैं, हर कतार में बिना हिचकिचाहट घुस जाते हैं। इसलिए आप कभी भी उनका साथ न छोड़ें।"
मौलाना मोहम्मद मुनीर नानौतवी (रह.) मौलाना मोहम्मद क़ासिम नानौतवी (रह.) के साथ साए की तरह लगे रहे, लेकिन मौलाना मोहम्मद क़ासिम साहिब को जिहाद का जुनून और शहादत की चाहत के आगे अपनी निगरानी की बिल्कुल जानकारी नहीं हुई।
1857 के इस जिहाद में मज़ाहिर उलूम के मुख्य सदस्य हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) ने भी अपनी हिम्मत, शहादत और दिलेरी का परिचय दिया। एक गोली आपके टखने में लगी, जिससे आप बेहोश हो गए थे। पूरा वाकया हजरत मुफ़्ती महमूद हसन गंगोहवी (रह.) के शब्दों में सुने:
"मुझसे एक व्यक्ति ने हरदोई में बयान किया कि हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) अपनी ज़ुबान बहुत अधिक अपने होंठों पर फेरते थे। किसी के पूछने पर आपने बताया कि 1857 के जिहाद में मैं भी शामिल था। मेरे पैर में गोली लगी और मैं गिर गया। उसी समय मैंने देखा कि हूरें शरबत के गिलास लेकर आईं और शहीदों को पिलाना शुरू किया। एक गिलास मेरे सामने भी लाया गया। जब मैंने उसे अपने मुंह से लगाया और मेरा होंठ तर हुआ, तो उन्होंने यह कहकर गिलास हटा लिया कि अभी इसकी ज़िंदगी बाकी है, यह शहीदों में से नहीं है। वह स्वाद अब तक मेरे होंठों पर बाकी है, जो मुझे चैन नहीं लेने देता।"
हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) ने 1857 की स्वतंत्रता संग्राम के बाद कुछ साल तक छुपकर जीवन बिताया, क्योंकि इस युद्ध में शामिल सभी लोगों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुके थे। प्रोफेसर अयूब कादरी ने "तज़किरा मौलाना मोहम्मद अहसन नानौतवी (रह.)" में लिखा है कि हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) ने छुपकर रहने का समय बरेली में बिताया, जहाँ आपके भाई मौलाना मोहम्मद अहसन साहिब का निजी प्रेस था।

मज़ाहिर उलूम में तशरीफ आवरी

1283 हिजरी में जब फक़ीहुल-असर हजरत मौलाना सआदत अली साहिब ने मज़ाहिर उलूम की स्थापना की, तो हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) जैसे काबिल और फाज़िल, आलिम-ओ-माहिर और उनके मुरशिद सय्यिदुत्तईफा हजरत हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की (रह.) की ज़बान में "यकताए ज़माना" की ज़रूरत थी। इसलिए खुद हजरत बानी अलैहिर्रह्मा नानौतह तशरीफ ले गए और अपने साथ मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) को लाए। उस समय मज़ाहिर उलूम की उम्र सिर्फ तीन महीने थी। इस प्रकार, शव्वाल 1283 हिजरी में मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) ने अपने कदम-ए-मुबारक से मज़ाहिर उलूम को सम्मानित किया।
जब मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) सहारनपुर तशरीफ लाए, तो जनाब मुंशी नवल किशोर साहिब लखनऊ से मुलाकात के लिए आए। लेकिन उनकी वज़ा और शक्ल-ओ-सूरत से यह बताना मुश्किल था कि वे मुसलमान हैं या हिंदू। यह सब हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.) की बरकत थी। मुंशी नवल किशोर ने उस समय मज़ाहिर उलूम में चल रही एक इमारत की तामीर के लिए एक सौ पैंतालीस रुपये भी दिए थे। इसके अलावा, वे अपने मक्तबा की वक़ीअ किताबों और मत्बूआत से भी मज़ाहिर उलूम को नवाजते रहते थे। (मुंशी नवल किशोर का ज़िक्र हजरत मुहद्दिस-ए-आज़म (रह.) ने "मजमुआ बहरुल-अनवार" के मुकद्दम-ए-किताब में भी किया है।)
मज़ाहिर उलूम सहारनपुर आने के बाद, आपको प्रधानाचार्य का महत्वपूर्ण पद सौंपा गया। इसके अलावा, हदीस और तफ़सीर की उच्च गुणवत्ता वाली किताबें आपकी देखरेख में रहीं। आपकी शिक्षा और प्रयासों की वजह से छात्रों की योग्यता और क्षमता में पक्का सुधार हुआ। आपसे संबंधित कक्षाओं और समूह के छात्र पूरे मदरसे में सबसे उच्च अंक प्राप्त करते थे। परीक्षकों ने मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) की योग्यता, कौशल, शैली और छात्रों पर मेहनत की प्रशंसा की। आपकी मेहनत से शिक्षा का स्तर भी ऊँचा हुआ और छात्रों की सफलता का औसत बढ़ गया।
मदरसों के जिम्मेदार व्यक्तियों, जैसे कि फक़ीह-उल-असर हजरत मौलाना सआदत अली सहारनपुरी (रह.), हजरत क़ाज़ी फ़ज़लुर्रहमान साहिब और शेख़ुल हिंद (रह.) के पिता हजरत मौलाना जुल्फ़िकार अली साहिब देबंदी (वफ़ात 1904 ई.) ने बड़े उत्साह के साथ इसको स्वीकार किया और उम्मीद जताई कि अन्य शिक्षक भी मौलाना साहिब की तरह शिक्षा में रुचि लेंगे।
1301 हिजरी में, हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) के निधन से एक वर्ष पहले, मज़ाहिर उलूम के संरक्षक, हजरत मौलाना रशीद अहमद गंगोही (रह.), ने मज़ाहिर उलूम के छात्रों की परीक्षा ली। जो छात्र हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) के पास पढ़ते थे, उनकी तारीफ इन शब्दों में की:
"यह अज्ञात बंदा जो 24 जमादी-उल-आखिर 1301 हिजरी को मदरसा अरबिया सहारनपुर में उपस्थित हुआ, तो कुछ कक्षाओं की परीक्षा ली। इनमें से दो व्यक्ति, जो जमाअत-ए-औला के छात्र थे और जिनके उस्ताद मौलवी मोहम्मद मज़हर साहिब थे, सक्षम और उच्च क्षमता वाले पाए गए, जो पढ़ने में विचार और समझ को शामिल करते थे। इसलिए उन्हें जुम्मा के दिन आम सभा में अनुमति देकर दस्तार बांधी गई।"
हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) लगभग 19 वर्षों तक मज़ाहिर उलूम की सेवा करते रहे। हालांकि आपका वेतन केवल पच्चीस रुपये था, फिर भी आपने बड़ी-बड़ी पेशकश और आकर्षक तनख्वाह को ठुकरा दिया। खुद मौलाना सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ बुलाया, लेकिन आप नहीं गए, क्योंकि मज़ाहिर उलूम आपके बुजुर्गों और उस्तादों का मदरसा था, जिससे आपको अत्यधिक प्रेम और लगाव था। इन 19 वर्षों के दौरान आपने निम्नलिखित किताबों का नियमित पाठ दिया:
1. बुखारी शरीफ 2. मुस्लिम 3. तिर्मिज़ी 4. अबू दाऊद 5. नसाई 6. इब्ने माजा 7. मिश्कात शरीफ 8. मुअत्ता इमाम मालिक 9. सुन्नन दारमी 10. शमाइले तिर्मिज़ी 11. हिदाया 12. दुर्रेमुख़्तार 13. कुदूरी 14. कंज़ुद द्क़ाइक़ 15. शरह विक़ाया 16. नूरुल अनवार 17. उसूल-उश-शाशी 18. जलालैन शरीफ 19. कुरान का अनुवाद 20. बैयज़ावी शरीफ 21. कश्शाफ़ 22. मुख़्तसरुल मआनी 23. दीवाने मुतनब्बी 24. मक़ामाते हरीरी 25. हमासाह 26. सबआ मुअल्लक़: 27. नफ़्हतुल यमन 28. तारीखे यमनी 29. कसिदा हमज़िया 30. तारीख-ए-तैमूरी 31. जबर-ओ-मुक़ाबला 32. हिस्नो हसीन 33. नुख्बतुल फ़िक्र 34. ख़ुत्बा-ए-क़ामूस इन किताबों में से कुछ ऐसी थीं जिन्हें वे एक साल में दो बार पढ़ाते थे।
शिक्षा और तालीम के अलावा, हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) ने मज़ाहिर उलूम की निर्माण, वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था के लिए दूर-दराज की यात्राएँ और छात्रों की निगरानी का ख्याल रखा। जब तक वे जीवित रहे, उन्होंने अपनी जान, धन, कदम और वचन से पूरी मदद और देखभाल की ज़िम्मेदारी निभाई। मौलाना अब्दुल हई के शब्दों में, "आपने अपने आपको मज़ाहिर उलूम के लिए वक़्फ़ और फना कर दिया था।"
मौलाना सैय्यद मोहम्मद सानी हसनी मजाहिरी (1354 हिजरी - 1399 हिजरी) लिखते हैं: "दरअसल, मज़ाहिर उलूम की तरक्की और नए निर्माण में आपका हाथ विशेष रूप से रहा। और इसी के नाम पर इस मदरसा अरबिया का नाम मज़ाहिर उलूम रखा गया। अल्लाह ने आपको सादगी और गंभीरता, विनम्रता और दीनता, एहतियात और परहेज़, इबादत और रियाज़त के साथ-साथ बुद्धिमत्ता, प्रबंधन की अच्छी क्षमता, ज्ञान और गुणों से पूरी तरह नवाज़ा था।"
हजरत मौलाना मुफ्ती मोहम्मद नसीम साहब फरीदी अमरोही (रहमतुल्लाह अलैह) (वफ़ात 1409 हिजरी/1988 ईस्वी) लिखते हैं: "आपने अपनी पूरी उम्र मदरसा मज़ाहिर उलूम सहारनपुर में क़ुरान और हदीस की तालीम-ओ-तदरीस और उलूम-ओ-फुनून की नशर-ओ-इशाअत में गुज़ारी।"
आगे लिखते हैं: "मौलाना मोहम्मद मज़हर साहब एक जदीद और अनुभवी आलिम थे। उलूम-ओ-फुनून में आपको गहरा रसूख हासिल था। मदरसा मज़ाहिर उलूम के प्रधानाध्यापक नियुक्त हुए।"
जनाब सर सैयद अहमद खान ने मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रहमतुल्लाह अलैह) की वफ़ात पर लिखा था: "अफ़सोस है कि मौलवी मज़हर, जो अरबी मदरसा सहारनपुर में अध्यापक थे और उन्हीं की ज़ात-ए-बा बरकत से इस मदरसे को रौनक़ और इज़्ज़त थी।"
आगे लिखते हैं: "बीस साल से ज़्यादा उन्होंने अपनी क़ौम में उलूम-ए-दीन को लाभ पहुँचाने पर कमर कसी थी और अरबी मदरसा सहारनपुर में लग गए। आमदनी मदरसे से सिर्फ पच्चीस रुपये माहवार गुसर बसर के बक़दर लेते थे और उलूम की तालीम में व्यस्त रहते थे। बहुत लोगों ने उनसे लाभ उठाया।"
बहरहाल, मौलाना मौसूफ़ (रह.) अपनी पूरी ज़िन्दगी मदरसे की देख-रेख, ख़बरगीरी, प्रशासनिक कार्यों से लेकर शोक्षिक कार्यों तक पूरा नियंत्रण रखते थे। मौलाना मोहम्मद ज़करिया (रहमतुल्लाह अलैह) (वफ़ात 1982 ईस्वी/1303 हिजरी) फरमाते हैं: "हज़रत ममदूह गोया इब्तिदा-ए-मदरसा से अब तक हर प्रकार का जुज़वी-ओ-कुली (छोटा और बड़ा) निज़ाम फ़रमाते थे।"

बैअत और ख़िलाफ़त (निष्ठा स्वीकरण व उत्तराधिकार)

हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) के पारिवारिक संबंध शुरू से ही हज़रत हाजी इमदादुल्लाह साहिब मुहाजिर मक्की (रह.) से थे। यहाँ तक कि घर की औरतें भी हज़रत हाजी साहिब (रह.) से बैअत और अकीदत का संबंध रखती थीं। हज़रत हाजी साहिब (रह.) भी समय-समय पर नानौता तशरीफ ले जाते थे, जिससे खानकाह लुत्फ़ अली में बहार आ जाती थी और हर व्यक्ति खुश नजर आता था। हज़रत हाजी साहिब (रह.) की विलादत भी 1233 हिजरी में नानौतह में ही हुई थी। आपकी एक बहन भी नानौतह में थीं, इस लिए आना-जाना खूब होता था। हज़रत हाजी साहिब (रह.) की विशेष तवज्जोह और कृपा खानदान के बच्चों पर थीं, इसलिए मौलाना मोहम्मद मज़हर, मौलाना मोहम्मद अहसन, और मौलाना मोहम्मद मुनीर साहिब (रह.) हज़रत हाजी साहिब के आशीर्वाद से कैसे महरूम रह सकते थे। चूंकि सबसे पहले मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) ने हज़रत हाजी साहिब (रह.) से श्रद्धा और निष्ठा का संबंध क़ायम किया था।
प्रोफेसर अयूब क़ादरी (रह.) लिखते हैं:
"हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.), उस्ताद-ए-हदीस, हज़रत हाजी इमदादुल्लाह साहिब मुहाजिर मक्की (रह.) और मुहद्दिस गंगोहवी हज़रत मौलाना रशीद अहमद साहिब (रह.) से बैअत के इजाज़तशुदा (जिसको अनुमति दी गयी हो) थे।"
आदरनीय शिक्षक हज़रत मौलाना अतहर हुसैन साहिब (रह.) फरमाते हैं:
आपने शेख़ गंगोही (रह.) से बैअत की और उनसे ख़िलाफ़त प्राप्त की। आपने शुरू में शेख़ इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की (रह.) से अज़कार (ध्यान और ध्यान तकनीक) हासिल किए थे। इसके बाद, शेख़ इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की (रह.) ने यह जिम्मेदारी शेख़ गंगोही (रह.) को सौंप दी, जैसा कि "इमदादुल-मश्शाक" में उनके कुछ रिसालों (ख़त या किताबें) में दिखता है।
हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) जब हज-ए-बैतुल्लाह के लिए मक्का मुअज़्ज़मा पहुंचे, तो अपने मुरशिद-ए-रूहानी, महबूब सुब्हानी हजरत हाजी इमदादुल्लाह साहिब मुहाजिर मक्की (रह.) से विशेष मुलाकातें कीं और उनसे फैज़ हासिल किया।
हकीमुल-इस्लाम हजरत क़ारी मोहम्मद तय्यिब साहिब (रह.) अपने वालिद साहिब (रह.) के हवाले से लिखते हैं:
"हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) ने एक बार ख़्वाब देखा कि एक तख़्त है जिसके ऊपर हज़रत गंगोहवी (रह.) और हजरत नानौतवी (रह.) तशरीफ़ रखते हैं। मौलाना ने यह ख़्वाब एक अरीज़ा (पत्र) में लिखकर, जिसमें बैअत की दरख़्वास्त भी थी, हजरत हाजी इमदादुल्लाह साहिब (रह.) की ख़िदमत में भेज दिया। हजरत ने जवाब में ख़्वाब की ताबीर (व्याख्या) यह लिखी कि दोनों में से किसी से बैअत कर लो। चूंकि मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब हजरत नानौतवी (रह.) के पास ख़त लेकर आए कि मुझे बैअत कर लो, उन्होंने घबराकर फरमाया कि आप ही मुझे बैअत फरमा लें। फरमाया कि लो यह ख़त है और हुक्म है। हजरत मौलाना मोहम्मद क़ासिम नानौतवी (रह.) ने (इस ख़त को पढ़कर) फरमाया कि मैं आपको सही मशवरा देता हूँ कि गंगोह तशरीफ़ ले जाएं। वहाँ गए तो हजरत गंगोहवी (रह.) ने भी यही फरमाया, लेकिन फिर बैअत फरमा लिया।"
हज़रत मौलाना अब्दुल हई साहिब (रह.) फरमाते हैं:
वह एक बहुत बड़े विद्वान और फनून (कलाओं) में माहिर थे। उन्होंने इमाम रशीद अहमद गंगोहवी (रह.) से बैत की और उनसे इजाज़त (अनुमति) प्राप्त की। वह क़ुरान की बहुत अधिक क़िराअत (पाठ) करते थे, हमेशा ज़िक्र में लगे रहते थे, उनकी ज़बान अल्लाह के नाम से भीगी रहती थी, तकल्लुफ से दूर, ज़ाहिद (परहेज़गार) और सादगी पसंद व्यक्ति थे और उनके ऊपर एक विशेष प्रतिष्ठा और गंभीरता थी।
शैखुलहदीस हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब मुहाजिर मक्की (रहमतुल्लाह अलैह) फरमाते हैं: "हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रहमतुल्लाह अलैह) उम्र में हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोहवी से बड़े थे, लेकिन हज़रत के ख़ुलफा और महबूब तरीन ख़ादिम थे।"
मौलाना मोहम्मद सानी हसनी मज़ाहिरी (रहमतुल्लाह अलैह) लिखते हैं: "हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोहवी (रह.) से उम्र में बड़े थे, लेकिन उन्होंने उनसे बैत की और बैत के बाद उनकी मोहब्बत और इश्क़ में डूब गए। हज़रत गंगोहवी (रह.) भी आपकी बड़ी इज़्ज़त करते थे और आपको इजाज़त-ओ-ख़िलाफ़त से भी नवाज़ा।"
हज़रत मौलाना आशिक़ इलाही साहिब मेरठी (रह.) (वफ़ात 1 शाबान 1362 हिजरी - 1943 ईस्वी) फरमाते हैं: "मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) उम्र में हज़रत इमाम रब्बानी से बड़े थे, मगर श्रद्धा के एतबार से गोया हज़रत के जां-निसार ख़ादिम और आशिके जां-बाज़ थे। जब आप (गंगोह) तशरीफ़ लाते तो बेइख़्तियार हज़रत (गंगोहवी) के क़दमों का बोसा लेते और आँखों में आँसू भर लाते... हज़रत इमाम रब्बानी शर्माते और यों फरमाते कि 'मौलाना, आप मुझे क्यों शर्मिन्दह फरमाते हैं, आप मेरे बड़े हैं, मुझ पर आपका अदब ज़रूरी है, आप ऐसा काम करते हैं तो मुझे बड़ी शर्म आती है।'
मौलाना मज़हर साहिब (रह.) साहिब-ए-बसीरत थे, हज़रत के बुलंद शान और मर्तबे और अपनी अत्यधिक मोहब्बत के कारण जो कुछ करते थे, वह उनका स्वाभाविक तक़ाज़ा था, मगर हज़रत इमाम रब्बानी बुज़ुर्गों का पास और लिहाज़ और जनाब रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के इरशाद 'मल लम यरहम सग़ीरना व लम युअक्किर कबीरना फ़लइसा मिन्ना' (जो छोटो पर रहेम न करे और बड़ों की इज्ज़त न करे वोह हम मैं से नहीं है ) की मिसाल को भूल नहीं सकते थे।"
शेख़ुल हदीस हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.) के सम्मान और अज़मत का पता उनकी व्यक्तिगत और शिक्षात्मक उपलब्धियों से चलता है, लेकिन यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि हम यह जानें कि उलमा-ए-देवबंद के रूहानी पेशवा, सय्यिदुत्ताइफा हज़रत हाजी इमदादुल्लाह साहिब (रह.) की नजरों में उनके इस अनमोल रतन की क्या वक़अत और इज़्ज़त थी।
"मरकूमात-ए-इमदादिया" में हज़रत हाजी साहिब (रह.) ने फ़रमाया:
"अगर मौलवी मोहम्मद मज़हर नानौतह में तशरीफ रखते हों तो बाद सलाम शौक़ मुलाक़ात फरमाकर यह पैगाम दें कि इस यकताए ज़माना को अपनी जमाअत में, अपने दोस्तों में शुमार करता हूँ। दुआ-ए-ख़ैर से ग़ाफ़िल नहीं हूँ, ख़ातिरजमई फरमादें और जो कुछ ज़िक्र-ओ-शुगल से संबंधित दरयाफ़्त करना मंसूर हो तो अहकर के जरिए या मौलवी रशीद अहमद साहिब कि उनको अहकर की जगह जानें, मालूम करें।"
सैय्यद अल-ताइफ़ा हज़रत हाजी इमदादुल्लाह साहिब (रह.) की इस तहरीर से हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.) के बुलंद ओ बाला मकाम-ओ-मर्तबत, आपकी अज़मत, शान और जलालत का पता चलता है, जो हज़रत हाजी साहिब (रह.) की नज़रों में थी।

तक़वा और तहारत (धार्मिकता और पवित्रता)

हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) जिस तरह इल्म और फन में यकता थे, उसी तरह खलूस और लिल्लाहियत (ईमानदारी और अल्लाह के प्रति समर्पण), ज़ुहद (साधुता) और इबादत, इस्तग़ना (अविश्वास) और तवक्कुल (भरोसा), सलूक और तसव्वुफ़ (आध्यात्मिकता), तक़वा और तदीन (धार्मिकता) में भी अपनी मिसाल आप थे और अपनी आरिफ़ाना (ज्ञानी) सिफ़ात (गुण), बुज़ुर्गाना आदात (आदतें), मुत्त्तकियाना (धार्मिक) ख़ुसूसियात और शमाइल-ओ-ख़साइल (चरित्र) की वजह से मशहूर और मअ'रूफ (प्रसिद्ध) थे।
मज़ाहिर उलूम सहारनपुर के पूर्व शैखुलहदीस हज़रत मौलाना मोहम्मद ज़करिया साहिब मुहाजिर मदनी (रह.) फरमाते हैं: "मदरसे के समय में जब कोई मौलाना का अज़ीज़ (प्रियजन)निजी मुलाक़ात के लिए आता तो उससे बातें शुरू करते वक़्त घड़ी देख लेते और वापसी पर घड़ी देख कर (हज़रत किताब में एक परचा रखा रहता था) उस पर तारीख और उन मिनटों का इंद्राज (लिख लेते) फरमा लेते और माह के ख़त्म पर उन मिनटों को जमा फरमा कर अगर निस्फ़ यौम (आधे दिन) से कम हों तो आधे रोज़ की छुट्टी ले लेते और अगर निस्फ़ यौम से ज़्यादा होता तो एक रोज़ की छुट्टी मदरसे में लिखवा देते। अलबत्ता अगर कोई फतवा आदि पूछने आता या मदरसे के किसी काम से आता तो उसका इंद्राज नहीं फरमाते थे।"

हज-ए-बैतुल्लाह

हजरत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहब को लंबे समय से हज-ए-बैतुल्लाह की तमन्ना थी और बेशक यह हर मुसलमान की ख्वाहिश होनी चाहिए। अल्लाह रब्बुल इज्जत ने उनकी इस ख्वाहिश को पूरा किया और ज़ाहिरी असबाब (संसाधन) भी महैया हो गए। उन्होंने पहला हज 1277 हिजरी (1881 ईस्वी) में किया। फिर सत्रह साल के बाद, दूसरी बार हज-ए-बैतुल्लाह की सआदत से सरफराज हुए। यह वह दौर था जब तुर्की और रूस के बीच जंग चल रही थी। अवाम में यह मशहूर हो गया कि हकीकत में हज का बहाना करके वह रोम (तुर्की) जा रहे हैं ताकि तुर्की हुकूमत की तरफ से वालिटियर जमाअत में शिरकत फरमा कर जिहाद करें, मगर लोगों का यह खयाल गलत था।
हज के सफर पर जाने वाला यह काफिला तकरीबन सौ अफराद पर मुष्तमिल था। हजरत मौलाना मोहम्मद ज़कारिया साहिब (रह.) के मुताबिक, बारह शवाल को सहारनपुर से रवाना हुए। उस दौर के मशहूर उलमा को उनके साथ हज की सआदत हासिल हुई। इस मुबारक काफिले मेंमशहूर उलमा में से हजरत मौलाना मोहम्मद कासिम नानौतवी (रह.) (1248 हिजरी - 1297 हिजरी), हकीम ज़िया उद्दीन साहिब, मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब अपनी अहलिया के साथ, मौलाना मोहम्मद याकूब साहिब नानौतवी (1249 हिजरी - 1302 हिजरी), हजरत मौलाना रफी उद्दीन साहिब, हजरत मौलाना महमूद हसन साहिब देवबंदी (1268 हिजरी - 1339 हिजरी), हजरत मौलाना हकीम मोहम्मद हसन साहिब, मौलवी हकीम मोहम्मद इस्माइल साहिब, हजरत मौलाना अहमद हसन साहब कानपुरी, हजरत मौलाना इनायत इलाही (रह.), हजरत मौलाना मोहम्मद मुनीर नानौतवी (विलादत 1247 हिजरी) और ब्रादर-ए-असगर(छोटे भाई) मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब शामिल थे। यह वफद इमाम रब्बानी हजरत मौलाना रशीद अहमद गंगोहवी (रह.) की सआदत और कयादत में 12 शवाल 1294 हिजरी को सहारनपुर से रवाना हुआ। 21 ज़िलक़ादा को यह काफिला खैर-ओ-आफियत के साथ मक्का मुअज़्ज़मा पहुंचा और रबीअल-अव्वल 1295 हिजरी में वापस तशरीफ लाया।
हज़रत मौलाना अब्दुल हई साहिब (रह.) फरमाते हैं: "हज के इस पवित्र सफर में मक्का मुअज्ज़मा में पेशवा-ए-देवबंद हज़रत हाजी इमदादुल्लाह थानवी मुहाजिर मक्की (रह.) से विशेष मुलाकातें कीं और फैज़ हासिल किया। इसके अलावा, मदरसा सौलतिया मक्का मुअज्ज़मा के बानी मुनाज़िर-ए-इस्लाम हज़रत मौलाना अल्लामा रहमतुल्लाह साहिब किरानवी बिन खलीलुर्रहमान से भी मुलाकात फरमाई। साथ ही, मदीना मुनव्वरा में हज़रत शेख़ अब्दुल गनी बिन सईद अल-उमरी से भी मुलाकात की और खूब फैज़ हासिल किया।"
बहरहाल, इस लंबे सफर के लिए हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर नानौतवी (रह.) ने 6 महीने की छुट्टी ली। आपके सभी पाठ, अध्यक्षता की जिम्मेदारियाँ और अन्य कार्यों को हदीस के बड़े विद्वान हज़रत मौलाना अहमद अली साहिब मुहद्दिस सहारनपुरी (रह.) ने अपनी विभिन्न मशगूलियों के बावजूद अच्छे ढंग से पूरा किया। जैसा कि मदरसा मज़ाहिर उलूम की रूदाद में लिखा है।
मौलवी मोहम्मद मज़हर (मुख्य शिक्षक), मौलवी अहमद हसन (द्वितीय शिक्षक), मौलवी इनायत इलाही (मदरसे के लेखाधिकारी) और पीर मोहम्मद खान (सहायक) ने हज-ए-बैतुल्लाह और हरमैन शरीफीन की जियारत के लिए इस मदरसे से साल के शुरू से छह महीने की छुट्टी मांगी। चूंकि उनकी इस दरख्वास्त के मुताबिक, उन्हें छुट्टी दी गई, लेकिन वक्त की मजबूरी और फंड की कमी के कारण छुट्टी के दिनों में तनख्वाह नहीं दी गई। शिक्षकों की गैर हाजिरी के दिनों में, मौलवी अहमद अली साहिब हमेशा मदरसे में तशरीफ लाते और प्रथम वर्ष और अन्य कक्षाओं को पढ़ाते रहते।
(और अधिक जानकारी के लिए, "आइना मज़ाहिर उलूम" भाग 10, अंक 4 और 5 में मौलाना अहमद अली साहिब (रह.) के तजकिरे में देख सकते हैं।)

इल्मी कारनामे (साहित्यिक योगदान)

हजरत फख्रुल-अमासिल (अलैहिर्रहमा) का सबसे बड़ा योगदान मज़ाहिर उलूम सहारनपुर है, जिसे मदरसे से एक प्रतिष्ठान बनाने में आपका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसकी निरंतर ख्याति, जनता में लोकप्रियता, इसके फुज़लाओं (स्नातकों) और फारीगीन (स्नातकों) में ज़ुहद (धैर्य और साधुता), तसव्वुफ़ (आध्यात्मिकता) और लिल्लाहियत (ईश्वर के प्रति समर्पण), उच्च शिक्षा स्तर, प्रतिष्ठा की उच्चता, शिक्षकों और कर्मचारियों के समय की पाबंदी, अकाबिर (बड़े विद्वान) मज़ाहिर उलूम और वलीयुल्लाही मस्लक (सिद्धांतों) की सुरक्षा, कुल मिलाकर मज़ाहिर उलूम सहारनपुर की हर प्रकार से सेवा, दीनियात के छात्रों और नबवी (पैगंबरी) ज्ञान की प्यास बुझाने का काम सब का सेहरा आप ही के सर है।
इसके अलावा, हजरत फख्रुल-अमासिल ने साहित्यिक कार्यों में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है, लखनऊ के मक्तबा नवलकिशोर में प्रकाशित होने वाली पुस्तकों की संशोधन का कार्य आप पूरी जिम्मेदारी के साथ करते थे। और ज्ञानवर्धक लोग इस बात से वाकिफ होंगे कि किसी भी साहित्यिक और शोधात्मक कार्य की संशोधन का काम लेखन और तालीफ (संपादन) से भी बढ़कर होता है, और संशोधन में दो गुनी जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
हजरत फख्रुल-अमासिल के छोटे भाई, प्रतिष्ठित लेखक, उच्च और गहन ज्ञान के विशेषज्ञ हजरत मौलाना मोहम्मद अहसन साहब नानौतवी (रह.), जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया था और दिल्ली कॉलेज से अरबी की पढ़ाई पूरी की थी, उनके कई साहित्यिक कृतियों की संशोधन भी की। प्रोफेसर अयूब कादरी (रह.) (वफ़ात 1404 हिजरी) लिखते हैं:
"फ़िक़्ह-ए-हनफी की मशहूर और प्रचलित किताब 'दुर्रे मुख़्तार' का उर्दू अनुवाद मशहूर विद्वान मौलाना खुर्रम अली बिलहौरी (वफ़ात 1271 हिजरी / 1854 ईस्वी) ने नवाब जुल्फ़िकार उद्दौला रईस बांदा की फ़रमाइश पर 1258 हिजरी / 1842 ईस्वी में 'किताब-ए-निकाह' से शुरू किया। मुहर्रम 1271 हिजरी / 1854 ईस्वी में, जब अनुवाद खत्म के करीब हुआ, तो मौलाना का इन्तेकाल हो गया। मौलाना मोहम्मद अहसन साहिब (रह.) ने इस अनुवाद को उनके वारिसों से प्रकाशन के उद्देश्य से खरीदा और बाकी का अनुवाद 'बाब-ए-अज़ान' से 'किताब-ए-सलाह' तक पूरा किया। जिन जगहों को मौलाना खुर्रम अली बिलहौरी (रह.) ने अधूरा छोड़ा था, उन्हें पूरा किया और इस अनुवाद को हर तरह से सही करके कुछ साथियों की साझेदारी में पहले चौथे खंड को मक्तब सिद्दीकी बरेली से प्रकाशित किया और इसका नाम 'ग़ायतुल औतार' रखा। लेकिन यह सिलसिला कायम न रह सका। मौलाना मोहम्मद अहसन (रह.) को इस बारे में बहुत चिंता हुई और उन्होंने इस बारे में एक विज्ञापन प्रकाशित किया। नवाब कल्ब अली खान,रईस रामपुर (वफ़ात 1204 हिजरी / 1887 ईस्वी) ने प्रकाशन के सभी खर्चों को वहन किया। मौलाना मोहम्मद अहसन (रह.) ने नवाब रामपुर की ज्ञानपरकता का विशेष उल्लेख किया है। इस पुस्तक के संशोधन और पूर्ति में मौलाना मोहम्मद अहसन के बड़े भाई मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब नानौतवी (वफ़ात 1302 हिजरी,प्रधान शिक्षक मदरसा मज़ाहिर उलूम सहारनपुर) भी शामिल रहे। इस मोटी और महत्वपूर्ण पुस्तक के चारों खंडों की छपाई 1288 हिजरी / 1871 ईस्वी में हुई।"
जनाब अयूब क़ादरी साहिब ने इस घटना का उल्लेख अपनी किताब "मौलाना मोहम्मद एहसन नानौतवी" में इस प्रकार किया है:
"मौलाना मोहम्मद मज़हर हदीस और फिक़्ह (इस्लामी कानून) में बड़ी दक्षता रखते थे। जब मौलाना मोहम्मद अहसन नानौतवी (रह.) ने मौलवी खुर्रम बिलहौरी (रह.) के वारिसों (उत्तराधिकारियों) से दुर्रे मुख्तार का उर्दू अनुवाद प्रकाशन के उद्देश्य से खरीदा, तो इस किताब के बाकी अनुवाद और सुधार में मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब नानौतवी (रह.) पूरी तरह से शरीक रहे, जैसा कि मौलाना मोहम्मद अहसन (रह.) ने किताब के मुक़द्दमें (प्रस्तावना) में उल्लेख किया है।"
हुज्जतुल इस्लाम हज़रत-ए-इमाम अबू मोहम्मद ग़ज़ाली (रह.) की मशहूर और धार्मिक पुस्तक "इह्याउ उलूमिद्दीन" का उर्दू अनुवाद मौलाना मोहम्मद अहसन नानौतवी (रह.) ने मुनशी नवल किशोर की फरमाइश पर 1281 हिजरी (1864 ईस्वी) से 1286 हिजरी (1869 ईस्वी) के बीच चार मोटे खंडों में किया। और इसका नाम "मज़ाक़ुल आरीफीन" रखा। अनुवाद सहज और सरल है, और तखरीजे इराकी के अनुसार हदीस के स्रोतों का हवाला हाशिए पर लिखा गया है।
हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.) ने भी इस पुस्तक का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया और जब हाशिए की आवश्यकताओं को देखा, तो "इहयाउ उलूमिद्दीन" के कई पुराने संस्करणों को बड़ी मेहनत से प्राप्त किया। मूल पुस्तक में छपती चली आ रही गलतियों को बहुत परिश्रम और मेहनत के बाद ठीक किया। इसके लिए पुराने संस्करणों को सामने रखा और जो वाक्य आपस में गडमड हो गए थे, उन्हें सही किया। फिर मुश्किल शब्दों की संक्षिप्त मगर व्यापक वैज्ञानिक व्याख्या की। इस क्रम में मिस्र के पुराने संस्करणों को भी सामने रखा और "मजम-उल-बिहार," "शरह हिस्नो हसीन," "बयज़ावी," "मदारिक," "कश्शाफ," "जलालैन," "कामूस," "मिस्बाहुल-मुनीर" और "सर्राह" आदि कृतियों से भी संदर्भ लिया।
इस पुस्तक के संशोधन और हाशिए में दारुल उलूम देवबंद के पहले प्रधान अध्यापक हज़रत मौलाना मोहम्मद याक़ूब साहिब नानौतवी (रह.) ने भी मदद की, जिसका उल्लेख पुस्तक के अंत में बड़े सजीव शब्दों के साथ किया गया है।
इस पुस्तक के अंत में हज़रत मौलाना मोहम्मद याक़ूब साहिब (रह.) द्वारा उर्दू, अरबी, और फ़ारसी में (काव्यात्मक) माद्दा हाए तारीखे तबाअत (प्रकाशन की तारीख़ के संबंधित) भी दर्ज हैं। जिनमें से एक उर्दू में इस मिसरे (पंक्ति) से तारीख़ तबाअत निकलती है।

"खूब छपी, खूब छपी, वाह वाह।" (1281 हिजरी):

मज़ाहिर उलूम सहारनपुर के प्रकाशन विभाग की तरफ से हर साल "इज्माली कैफ़ियत" नामक एक संक्षिप्त परिचय पुस्तक प्रकाशित होती है। इसके पृष्ठ 8 पर "खिदमत-ए-हदीस शरीफ" के अंतर्गत उल्लेख किया गया है कि हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब नानौतवी (रह.) ने "इह्याउ उलूमिद्दीन" के हाशिये की तरह "मजमा बिहारुल अनवार" का भी एक संक्षिप्त हाशिया लिखा है, जिसका उल्लेख मौलाना हबीबुर्रहमान साहिब मुहद्दिस अज़मी (रह.) ने इस किताब के प्रारंभिक पृष्ठों में किया है।

उल्लेखनीय छात्र

हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.) के सभी छात्रों और तलबा की संख्या सैकड़ों से अधिक है क्योंकि आपने मज़ाहिर उलूम में केवल एक या दो साल नहीं, बल्कि लगातार 19 साल तक नियमित रूप से दीनियात के छात्रों पर अपने ज्ञान और आध्यात्मिक प्रभावों की नदियाँ बहाई हैं। इन सभी उल्लेखनीय छात्रों की सूची के लिए कई पृष्ठों की आवश्यकता होगी, लेकिन यहाँ कुछ प्रसिद्ध और प्रमुख व्यक्तियों के नाम दिए गए हैं, जिनका उल्लेख हज़रत मौलाना अब्दुल हई साहिब हसनी (रह.) ने "नुज़हतुल ख़वातिर" की आठवीं जिल्द में किया है:
- हज़रत-ए-इस्लाम मौलाना मोहम्मद कासिम नानौतवी (रह.), बानी दारुल उलूम देवबंद (वफ़ात: 4 जमादिल अव्वल, 1297 हिजरी)
- हज़रत मौलाना अमीरबाज़ ख़ान (रह.) (1258 हिजरी/1842 ईस्वी - 1325 हिजरी/1907 ईस्वी)
- हज़रत मौलाना अशरफ़ अली सुल्तानपुरी (जन्म: 7 रमज़ान, 1268 हिजरी), हज़रत गंगोहवी (रह.) के खलिफह
- मुहद्दिस-ए-कबीर मौलाना खलील अहमद अंभीटवी (वफ़ात: 16 रबीउल अव्वल, 1346 हिजरी), हज़रत गंगोहवी (रह.) के खलिफह
- हज़रत मौलाना अब्दुल जब्बार उमरपुरी (प्रसिद्ध अरबी कवि)
- हज़रत मौलाना रागिबुल्लाह पानीपती (वफ़ात: 1314 हिजरी)
- हज़रत मौलाना नूर अहमद अमृतसरी (वफ़ात: 13 शाबान, 1348 हिजरी/1930 ईस्वी)
- हज़रत मौलाना हाफ़िज़ जान मोहम्मद, काज़ी रियासत टोंक
- हज़रत मौलाना अब्दुल मन्नान वज़ीर आबादी, माहिर-ए-हदीस व रिजाल और सिहाह के हाफिज (वफ़ात: 1334 हिजरी)
- हज़रत मौलाना मकीमुद्दीन कोटी टांकी, मदरसा शोकत-उल-इस्लाम, सैंडिला (हरदोई)
- हज़रत मौलाना हकीम रहीमुल्लाह बिजनौरी (वफ़ात: 1340 हिजरी)
- हज़रत मौलाना सैयद जमीयत अली पूरकाज़वी, प्रोफेसर अरबी कॉलेज, बहावलपुर (वफ़ात: 1341 हिजरी)
- हज़रत मौलाना फ़ख़रुल हसन गंगोहवी (वफ़ात: 1315 हिजरी)
- हज़रत मौलाना नूर मोहम्मद हक्कानी लुधियानवी (वफ़ात: 23 ज़िल्हिज्जा, 1343 हिजरी/1925 ईस्वी)
- हज़रत मौलाना मोहम्मद फारूकी, खलीफ़ा-ए-अजल हज़रत गंगोहवी (वफ़ात: 1320 हिजरी)
- हज़रत मौलाना हाफ़िज़ कमरुद्दीन सहारनपुरी (वफ़ात: 27 मुहर्रम, 1334 हिजरी)
- शैखुलहिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी (रह.), जिन्हें हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.) से इजाज़त-ए-हदीस प्राप्त है
- हज़रत मौलाना सिद्दीक़ अहमद अंभीटवी, मुफ़्ती रियासत मालेरकोटला, पंजाब (वफ़ात: 1342 हिजरी)
- हज़रत मौलाना साबित अली पूरकाज़वी, प्रथम शिक्षक, मज़ाहिर उलूम, सहारनपुर (वफ़ात: 20 रबीउल-थानी, 1342 हिजरी)
उपरोक्त नामों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितनी बड़ी हस्तियों और प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों ने हज़रत फख़रुल-अमासिल (रह.) से ज्ञान प्राप्त किया है। खुद हज़रत-ए-इस्लाम मौलाना मोहम्मद कासिम नानौतवी (रह.) भी हज़रत मौलाना के छात्रों में थे, जिसका उल्लेख शैखुलहदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया कांधलवी (रह.) ने इन शब्दों में किया है:
"ومن مفاخرہ ان الشیخ العلامۃ بحرالعلوم حضرت مولانا محمد قاسم النانوتوی اخذعنہ بعض الکتب الابتدائیۃ کمااخبرمولانا ثابت علی المدرس بمظاہرعلوم"
अनुवाद: "और उनकी उपलब्धियों में से एक यह है कि महान विद्वान, बहरुल-उल-उलूम हज़रत मौलाना मोहम्मद कासिम नानौतवी ने प्रारंभिक किताबों का अध्ययन उनसे किया, जैसा कि मौलाना साबित अली, शिक्षक, मज़ाहिर उलूम ने बताया।"
हज़रत मौलाना मोहम्मद ज़करिया साहिब (रह.) के इस कथन की पुष्टि "नुज़हत-अल-ख़वातिर" से भी होती है। इसके अलावा हज़रत मुफ़्ती मोहम्मद नसीम अमरोहवी (रह.) फरमाते हैं:
हज़रत मोलाना कासिम नानोत्वी (रहमतुल्लाह अलैह) ने भी आप से कुछ शुरूआती किताबें पढ़ी थीं।
हज़रत मौलाना अनवारुल हसन साहिब शेरकोटी ने हज़रत-ए-इस्लाम मौलाना मोहम्मद कासिम साहिब नानौतवी (रह.) की उन किताबों का भी उल्लेख किया, जो उन्होंने हज़रत फख़रुल-अमासिल (रह.) से पढ़ीं।
"हज़रत मौलाना मोहम्मद कासिम साहिब ने 'शरहु मिआति आमिल,' 'हिदयातुन नहु' इल्मुस्सिगा' वग़ैरह पढ़ी थीं।
हज़रत मुहद्दिस कबीर मौलाना खलील अहमद साहिब मुहद्दिस सहारनपुरी भी हज़रत फखरुल-अमासिल (रह.) के प्रमुख शिष्य हैं। शागिर्दी की स्थिति यह थी कि हज़रत फखरुल-अमासिल (रह.) की शादी सहारनपुर के एक गांव लिखनौती से हुई थी और हज़रत फखरुल-अमासिल (रह.) रमज़ान उल-मुबारक बिताने के लिए वहां जाते थे। हज़रत मुहद्दिस कबीर ने लिखनौती जाकर आपके ज्ञान के सागर से फ़ैज़ प्राप्त किया था।"

आदतें और मामूलात

हज़रत फखरुल-अमासिल (रह.) की खूबियों को बयान करने के लिए कई पृष्ठों की आवश्यकता है, फिर भी यहाँ कुछ विशेषताएँ प्रस्तुत हैं:
- कुरआन की तिलावत : आप कुरआन मजीद की तिलावत बहुत अधिक करते थे और हमेशा बहुत अधिक ज़िक्र (ध्यान) भी करते थे।
- इस्म-ए-ज़ात: "इस्म-ए-ज़ात" के ज़िक्र से हमेशा आपकी जुबान तर रहती थी।
- तकल्लुफ़ से दूर: आप तकल्लुफ़ (औपचारिकता) से दूर, दुनिया से बेपरवाह, और एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे। आपके चेहरे पर एक प्राकृतिक रौब (दबदबा) था।
- रौब और हैबत: आपका रौब और हैबत इतनी ज़्यादा थी कि बड़े-बड़े दिलवाले भी आपसे बात करने से डरते थे।
- निगरानी: मज़ाहिर उलूम की चहारदीवारी में शिक्षक से लेकर कर्मचारी तक, प्रारंभिक छात्र से लेकर वरिष्ठ तक सभी पर कड़ी नज़र रखते थे।
-इकराम और इज़्ज़त: मदरसे के कारिंदे और संरक्षकगण आपका बहुत इकराम (सम्मान) और पास-लिहाज रखते थे। वे मदरसे के काम को अपना काम समझकर करते थे। 1292 हिजरी से 1302 हिजरी तक मज़ाहिर उलूम के तीन संरक्षक रहे, लेकिन हज़रत फखरुल-अमासिल (रह.) ही इसकी रूह थे।
- समय की पाबंदी: आप मदरसे में हमेशा समय पर आते थे, कभी भी देर नहीं करते थे। आप मदरसे का पूरा प्रबंधन पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाते थे। आप बहुत कम बोलते थे, सच्चे और साधारण व्यक्तित्व के मालिक थे।
- तरावीह और जुम्मा की नमाज़: रमज़ान उल-मुबारक में तरावीह के समय खुशबू लगाना आपका रिवाज था। आप जुम्मा की नमाज़ जामा मस्जिद में अदा करते थे और समय-समय पर वहाँ तकरार (भाषण) भी करते थे, जिसमें मज़ाहिर उलूम की ज़रूरतों और इसके हालात से लोगों को परिचित कराते थे।

मृत्यु की घटना

आपकी मृत्यु की खबर का दुखद प्रभाव मज़ाहिर उलूम की रिपोर्ट में इस प्रकार वर्णित है:
"जनाब मौलाना मौलवी मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.), जिनके गुण बयान से बाहर हैं, उस समय रात 8 बजे, 24 ज़ुल्हिज्जा 1885 (रविवार) को गुर्दे के दर्द के कारण सहारनपुर में इस नश्वर दुनिया से विदा होकर जनत-उल-फ़िरदौस में जा बसे। इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।
इस दुखद घटना से भारत के मुस्लिम समुदाय और इस मदरसे के शुभचिंतकों को जितना दुख हुआ है, वह कम है। इस दुनिया से एक ऐसे विद्वान का उठ जाना, जो अक्खंडित, श्रेष्ठ, और सभी सामान्य और धार्मिक विज्ञानों में अग्रणी था, उत्तराधिकारियों की बहुत बड़ी बदनसीबी है। मौलवी सआदत अली मरहूम, बानी-ए-मदरसा की निगरानी और शिक्षा का सारा काम भी मौलाना साहिब ने, पढ़ाई के अलावा, अपने जिम्मे ले रखा था। मदरसे के बारे में जो कुछ भी होता था, वह मौलाना साहिब के परामर्श और सहमति के बिना नहीं होता था।
मौलाना मरहूम का इस नश्वर दुनिया से जाना इस शहर मदरसे के लिए बड़ी हसरत और दुःख का मामला है। अल्लाह तआला उन्हें मग़फिरत प्रदान करे और ऊंचे दर्जे से नवाज़े।"
इमाम रब्बानी हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोहवी (रह.) को जब मौलाना के इंतेकाल की खबर मिली, तो वे बहुत दुखी हो गए और हज़रत मुहद्दिस कबीर मौलाना खलील अहमद साहिब (रह.) को निम्नलिखित शोक संदेश भेजा:
"अब यह नया हादसा हुआ कि मौलवी मोहम्मद मज़हर मरहूम 24 ज़ुल्हिज्जा की रात को गुजर गए। दुनिया अंधेरी हो गई, अब सभी साथी विदा हो गए। देखें, मेरी किस्मत में इस दुनिया में कब तक धक्के बचे हैं।"
हज़रत मौलाना खलील अहमद साहिब अंभेटवी को अपने उस्ताद हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.) से अपार श्रद्धा और प्रेम था। एक बार जमादी-उल-सानी 1340 हिजरी में, जब वे गंभीर रूप से बीमार थे, तो उन्होंने अपनी वसीयत लिखी और उसमें लिखा: "मुझे अपने उस्ताद मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब नानौतवी (रह.) के पास दफन करें।"
लेकिन हज़रत मौलाना खलील अहमद साहिब (रह.) का रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से जो प्रेम था, वह दुनिया की किसी भी चीज से अधिक था। इसी वजह से रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के प्रति प्रेम और उनके शहर की कशिश ने उन्हें मदीना की ओर खींच लिया और वे दीयार-ए-रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) में दफन हैं, जहां की मिट्टी भी सूरज और चांद की किरणों और अल्लाह की अनवार-ए-इलाही (दिव्य प्रकाश) से रौशन है। हर मोमिन की जुबान पर यही शब्द होते हैं।
हज़रत शेख-उल-हदीस हज़रत मौलाना मोहम्मद अयूब कासमी (रह.) के अनुसार:

ज़मीरे पुर मआसी (पापों से भरे दिल) की यही है आरज़ू या रब
मदीने की ज़मीन पर काश मुझको मोत आजाए

हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.) के एक महान विद्वान मित्र और साथी, अदब-उल-हिंद हज़रत मौलाना फ़ैज़-उल-हसन सौनपुरी (रह.), जो लाहौर के ओरिएंटल कॉलेज में प्रोफेसर थे और अपना एक निजी अखबार "शिफ़ा-उल-सदूर" निकालते थे। जब उन्हें मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.) के निधन की खबर मिली, तो दुःख का पहाड़ टूट पड़ा। वे दुख और पीड़ा की तस्वीर बन गए और अपने अखबार में मौलाना की जीवनी और उनके शानदार कारनामों पर अपने हृदयस्पर्शी विचार व्यक्त किए। उन्होंने आपकी मृत्यु को बहुत बड़ी घटना बताया।
आपके एक और समकालीन विद्वान जनाब सर सैयद अहमद खान (मरहूम), जो मुस्लिम यूनिवर्सिटी अलीगढ़ के संस्थापक थे, को जब इस दुखद घटना की खबर मिली, तो उन्होंने भी अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजेट (किसी संगठन के द्वारा प्रकाशित एक आधिकारिक दस्तावेज़), अलीगढ़ के 10 अक्टूबर 1885 की प्रकाशित में अपने गहरे दुख और चिंता का इज़हार किया और अफसोस जताया कि मृत्यु ने आम लोगों और खास लोगों को मौलाना के आशीर्वाद से वंचित कर दिया।
शैखुलहदीस हज़रत मौलाना मोहम्मद ज़करिया साहिब कांधलवी (रह.) अपनी मशहूर किताब "तारीखे मज़ाहिर" में फरमाते हैं:
"हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब नानौतवी (रह.) का निधन 24 ज़ुल्हिज्जा 1302 हिजरी के अनुसार अक्टूबर 1885 की रात 8 बजे के करीब गुर्दे के दर्द से हुआ। हज़रत मौलाना (रह.) ने मदरसे के सभी छोटे और बड़े कामों की निगरानी की। मदरसे के कर्मचारियों की नियुक्ति और पदोन्नति जैसे मामलों को भी हज़रत मौलाना ही देख रहे थे। इस घटना का प्रभाव आम छात्रों और विशेष रूप से हदीस के छात्रों पर होना निश्चित था। हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर (रह.) उम्र में हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोहवी (रह.) से बड़े थे, लेकिन वे हज़रत के सबसे प्रिय खलीफा और सेवक थे।
आप ने 24 ज़ुल्हिज्जा 1302 हिजरी को रविवार के दिन सत्तर साल की उम्र में वफ़ात पाई।
बहरहाल, हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब नानौतवी (रह.) ज्ञान और अमल, ज़ोहदो तसव्वुफ, सहनशीलता और संयम, सत्यता और ईमानदारी, विनम्रता और आत्म-समर्पण, इखलास और दियानत, प्रभावशाली व्यक्तित्व, अल्लाह के डर और पवित्रता में बहुत आगे थे। आपकी मृत्यु के बाद, मदरसे के लिए एक ऐसे मुखलिस, मेहनती, धार्मिक, और बहादुर विद्वान की ज़रूरत थी जो आपके स्थान को भर सके, लेकिन कोई भी आपके जैसा नज़र नहीं आया। मजबूरन उस समय के मौजूदा शिक्षक और कर्मचारी के पदों में परिवर्तन किया गया।"
हजरत मौलाना मुफ़्ती अज़ीज़ुर्रहमान बिजनौरी (रह.) ने फरमाया:
"विसाल (मृत्यु) के समय हदीस शरीफ के अनुसार: 'علامة موت المؤمن حتی اذا قرب وصاله عرق جبينه,' यानी मोमिन की मौत की निशानी यह है कि विसाल का समय जब करीब आता है तो माथे पर पसीना आता है। विसाल के बाद आपका चेहरा बेहद रोशन और खुश दिखता था।
हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब नानौतवी (रह.) के एक करीबी रिश्तेदार हज़रत हकीम अहमद इशरती नानौतवी अपनी किताब 'मकतूबात मौलाना मोहम्मद याकूब' में फरमाते हैं:
"हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.) के तीन भाई थे और तीनों ही महान और विद्वान थे। जिनमें हज़रत मौलाना मोहम्मद अहसन साहिब नानौतवी (रह.) और हज़रत मौलाना मोहम्मद मुनीर साहिब (रह.) शामिल थे। हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.) की कोई औलाद नहीं थी, जबकि हज़रत मौलाना मोहम्मद एहसन के एक बेटा मौलवी मोहम्मद इस्माइल नानौतवी थे, और हज़रत मौलाना मोहम्मद मुनीर साहिब के भी एक बेटा महिबूबुर्रहमान थे।"
हज़रत मौलाना मोहम्मद मज़हर साहिब (रह.) के इल्म और इरफ़ान के अनमोल खज़ाने को सहारनपुर के मशहूर कब्रिस्तान शाह कमालुद्दीन (रह.) में हज़ारों गमगीन लोगों ने सुपुर्द-ए-खाक किया। आसमान उनकी क़ब्र पर शबनम बरसाए।