संस्थापक (बानियान-ए-किराम)

हज़रत क़ाज़ी फ़ज़लुर्रहमान सहारनपुरी रह

सय्यदुत्ताइफ़ह (समूहों के प्रमुख) हजरत हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की (रहमतुल्लाह अलैह) के अनुयायी और हजरत हाफिज़ ज़ामिन शहीद (रहमतुल्लाह अलैह) के खास मुरीद हजरत क़ाज़ी फ़ज़लुर्रहमान सहारनपुरी का नाम परिचय का मोहताज नहीं है। आप मज़ाहिर उलूम सहारनपुर के प्रथम दौर के विशेष सहायक और दूसरे अध्यक्ष थे। आप अत्यंत धार्मिक और चुने हुए व्यक्ति थे, जिनकी उदारता, परोपकारिता, संवेदनशीलता और मदरसे के हर मामले में उनकी सज्जनता के अमिट निशान छपे हुए हैं, जिनका सिला और इनाम अल्लाह तआला ही अता फरमाएंगे।
मज़ाहिर उलूम सहारनपुर को जिन दिव्य व्यक्तियों ने ज्ञान और कला का केंद्र और सुधार का आधार बनाया, उनमें एक प्रमुख नाम आपका भी है। मदरसे के कुल और व्यावहारिक कार्यों पर आपकी नजर रहती थी। मदरसे के संस्थापक हजरत मौलाना सआदत अली सहारनपुरी (रहमतुल्लाह अलैह) के दाहिने हाथ थे। जब 1286 हिजरी (1869 ईस्वी) में हजरत मौलाना सआदत अली (रहमतुल्लाह अलैह) का निधन हुआ, तो जिम्मेदारियां आपके पास आ गईं और 1290 हिजरी तक आपने बखूबी निभाई।
1291 हिजरी में हजरत मौलाना अहमद अली (रहमतुल्लाह अलैह), मुहद्दिस सहारनपुरी को आपके सहयोगी के रूप में नियुक्त किया गया और मदरसे की रिपोर्टों में दोनों व्यक्तियों के नाम अध्यक्ष के रूप में लिखे जाने लगे।
हजरत मौलाना अहमद अली (रहमतुल्लाह अलैह) का 1297 हिजरी में निधन हो गया, और खुद क़ाज़ी साहब वृद्धावस्था के कारण कमजोर हो गए। तब हजरत मौलाना हसन (रहमतुल्लाह अलैह), हजरत मौलाना जुल्फ़िकार (रहमतुल्लाह अलैह), हजरत मौलाना अहमद हसन (रहमतुल्लाह अलैह), हजरत मौलाना खलीलुर्रहमान (रहमतुल्लाह अलैह) और डिप्टी नजफ़ अली (रहमतुल्लाह अलैह) पर संयोजित एक समिति बनाई गई, जो न केवल क़ाज़ी साहब का सहयोग करती थी, बल्कि मदरसे के कुल और व्यावहारिक कार्यों में भी विशेष रुचि लेती थी।
3 रजब 1322 हिजरी को आपको शूरा के सदस्य बनाया गया और जीवन भर इस महान पद को सशक्त किया। 15 शव्वाल 1326 हिजरी, 10 नवम्बर 1908 ईस्वी, मंगलवार के दिन आपका निधन हुआ और ईदगाह से सटे पारिवारिक कब्रिस्तान में दफनाया गया।
मज़ाहिर उलूम की रिपोर्ट में क़ाज़ी साहब के कार्यों और सेवाओं को इन शब्दों में याद किया गया है:
"जनाब क़ाज़ी फ़ज़लुर्रहमान (रहमतुल्लाह अलैह) की श्रेष्ठताओं और विशेषताओं से कोई भी धर्म प्रिय व्यक्ति अनजान नहीं होगा। आपका हर दिलअज़ीज़ और हर एक इस्लामी सेवा में दिल और जान से लगे रहना एक प्राकृतिक गुण था। आपकी स्पष्टता, क्षमता और सक्षमता मुख्य कारण थे कि इस्लाम और सहारनपुर के हर मामले में सफल और भलाई होती थी।
सभी इस्लामी लोग दूर-दूर तक आपके मौजूदगी को धार्मिक मामलों में बड़ी कीमती समझते थे और बिना आपकी सलाह के इस्लामी मामलों में कोई कार्य नहीं होता था और आपकी ही सलाह से सभी धार्मिक कार्य संपन्न होते थे।
प्रारंभ से अब तक जनाब क़ाज़ी साहब ने हमेशा इस मदरसे की संरक्षा हर प्रकार से की और नकदी और जरूरी सामान से भी कमजोर स्थिति और प्रारंभिक समय में हर प्रकार की देखरेख की और सहयोग दिया। मदरसे से ऐसे संरक्षक का साया उठ जाना अत्यंत दुख और बड़ा आघात है। अल्लाह तआला उन्हें अपने रहमत की छाओ मैं जगह दे।" आमीन

(रिपोर्ट मज़ाहिर उलूम 1326 हिजरी)