प्रशासक (नुज़मा)

हज़रत मौलाना मुफ्ती मुज़फ़्फ़र हुसैन (रह.)

फकिहुल इस्लाम का जद्दी (बाप दादा का) वतन हापुड़, जिला गाज़ियाबाद के करीब टियाला क्षेत्र है। वहां से इस परिवार के पूर्वज ख़्वाजा अली अहमद साहिब के पुत्र जनाब लाल मोहम्मद ख़ान साहिब के पोते जनाब सनाउल्लाह ख़ान साहिब ने क़स्बा अजराड़ा, जिला मेरठ को अपना वतन बना लिया और यहीं उनकी संतान रहने लगी। इस तरह परिवार का वतन अजराड़ा बन गया।
आपका वंशावली (वंशक्रम) आपके दादा जनाब सनाउल्लाह ख़ान (रहमतुल्लाह अलैह) से होता हुआ परिवार के मुखिया जनाब नादिर अली (रहमतुल्लाह अलैह) , शाहि वज़ीर-ए-आला के भाई जनाब ख़्वाजा अली मरहूम से मिल जाता है। वंशक्रम इस प्रकार है:
हज़रत मौलाना मुफ्ती मुज़फ़्फ़र हुसैन (रहमतुल्लाह अलैह) , पुत्र हज़रत अक़दस मौलाना मुफ्ती क़ारी सईद अहमद (रहमतुल्लाह अलैह) , पुत्र जनाब मुंशी नूर मोहम्मद (रहमतुल्लाह अलैह) , पुत्र जनाब नसीबुल्लाह, पुत्र जनाब सना उल्लाह, रहमतुल्लाहि अलैहिम ।
जब आपकी उम्र लगभग ढाई साल की थी और आप अभी अपनी वालिदा (माता) की गोद से अलग नहीं हुए थे, यानी फरवरी 1931 ई. तक, तो अम का (तीसवां पारा) पाव हिफ्ज़ हो गया था और बहिश्ती ज़ेवर से विभिन्न नेक बीबियों के क़िस्से अपनी माता श्री से सुनकर ज़बानी याद कर लिए थे।
1332 हि में जब आपकी उम्र चौथे साल में प्रवेश कर गई, तो आपको मज़ाहिर उलूम के विशेष मक्तब में बैठा दिया गया। ग्यारह साल की उम्र में 1358 हि (मुताबिक 1949 ई) में आपने प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। उच्च शिक्षा के लिए १ मुहर्रमुल-हराम 1361 हि. को जामिआ मज़ाहिर उलूम में नियमित रूप से दाखिला लिया और हिफ़्ज़ (कुरान का याद करना), क़रीमा ( फारसी की किताब) , आदि की परिक्षा देने के बाद मिफ़ताहुल क़वाइद, इमला (लेखन), हिसाब (गणित) आदि पढ़ने के बाद 1362 हि में मीज़ानुस्सर्फ, मुनशईब, बुस्तान, इंशा ख़लीफा, माला बुद्दा मिन्हु, अहसनुल क़वाइद, गुलिस्तान पाठ आठ आदि की शिक्षा प्राप्त की।
साल 1363 हिजरी में सर्फे मीर, पंज गंज, इल्म-ए-सीग्हा, नहू मीर, शर्हू मिअति आमिल, फुसूले अकबरी, तैसीरुल मंतिक, इनशा दिलकशा, रुकआत-ए-आलमगीरी, रुकआत अमानुल्लाह हुसैनी और पंदनामा आदि।
साल 1364 हिजरी में हिदायतुन्नहू, मराहुल अरवाह, एसागौजी, मिरक़ात, काफिया, नूरुल ईज़ाह, मुफीदुत्तालिबीन, तहज़ीब और शरह तहज़ीब।
साल 1365 हिजरी में बहस-ए-फेअल, अल-मुख्तसरुल-कुदूरी, तस्दीका, नफहतुल यमन, अल्फिया इब्न मालिक, तर्जुमा कुरआन करीम और मीर कुतबी।
साल 1366 हिजरी में उसूलुशशाशी, ख़ुलासतुल बयान, तलख़ीसुल मिफ्ताह, हदिया सईदिया, मुक़द्दमा जज़री, कंज़ुद्दक़ाइक़, बहस-ए-इस्म और सुल्लमुल उलूम।
साल 1367 हिजरी में सब'आ मुअल्लका, रशीदिया, शातिबी, नूरुल अनवार, मक़ामाते हरीरी, शरह विकाया और मुख्तसर अल-कुदूरी।
साल 1368 हिजरी में इल्म-ए-फराइज़ की मशहूर किताब सिराजी, शरह नुखबतुल फ़िकर, मुक़द्दमा मिश्कात, हिदाया अव्वलैन, मिश्कात शरीफ और जलालैन शरीफ।
साल 1369 हिजरी में बुखारी शरीफ, मुस्लिम शरीफ, तिर्मिज़ी शरीफ, अबू दाऊद शरीफ, नसाई शरीफ, तहावी शरीफ, इब्ने माजा शरीफ, मोअत्ता इमाम मालिक रेह्मतुल्लाहि अलैह और मोअत्ता इमाम मोहम्मद रेह्मतुल्लाहि अलैह पढ़कर पहली रैंक से कामयाबी हासिल की।
आपने बुखारी शरीफ शुरू से किताब-उल-इल्म तक और बुखारी शरीफ की दूसरी जिल्द उस्ताद-उल-कुल हज़रत मौलाना सैयद अब्दुल लतीफ पूरकाज़वी रेह्मतुल्लाहि अलैह से, बुखारी शरीफ किताब-उल-वुज़ू से पहली जिल्द के खत्म तक और अबू दाऊद शरीफ हज़रत शेख़-उल-हदीस साहिब (रह.), तहावी शरीफ और नसाई शरीफ हज़रत मोहम्मद असदुल्लाह साहिब रेह्मतुल्लाहि अलैह से, तिर्मिज़ी शरीफ अपने वालिद मौलाना मुफ्ती सईद अहमद साहिब से और मुस्लिम शरीफ हज़रत मौलाना मंज़ूर अहमद ख़ान साहिब रेह्मतुल्लाहि अलैह से पढ़ने का शरफ हासिल किया।
आपके तकमीले उलूम (प्रमुख इस्लामी विज्ञान जैसे फिकह (इस्लामी न्यायशास्त्र), हदीस, तफ्सीर (कुरान की व्याख्या), और आक़ीदा (इस्लामी सिद्धांत) में निपुणता प्राप्त करना) के विशेष सहपाठियों में मौलाना मोहम्मद याकूब रंगूनी, मौलाना अब्दुल गनी, अमीर जमात मरकज़ अहमदाबाद, मौलाना अब्दुल गनी रंगूनी, मौलाना हाफिज़ फजलुर्रहमान कल्यानवी, मौलाना मोहम्मद जफर केरानवी, और मौलाना खैरुर्रहमान अहमद आबादी शामिल हैं।
दर्स-ए-निजामी से फारिग़ होने के बाद, आपने 1370 हिजरी में दरजा तकमीले उलूम में दाखिला लिया और हिदाया सालिस, तफ़सीरे मदारिकुत्त्तन्ज़ील, मुल्ला जलाल, उरूजुल मिफ्ताह, मुकद्दमा तक्रिब, अल-इत्कान फि उलूमिल कुरआन, मुकद्दमा कामूस, दुर्रेमुख़्तार, मेबज़ी, रस्मुल्मुफ्ती, मुल्ला हसन और बैज़ावी शरीफ पढ़ कर उच्च अंकों से कामयाबी हासिल की।
आपने उस्ताद-उल-कुल हज़रत मौलाना सैयद अब्दुल लतीफ साहिब पूरकाज़ी रेह्मतुल्लाहि अलैह से उपरोक्त किताबों के अलावा मुकद्दमा-ए-तक़रीब, मुकद्दमा-ए-कामूस, दुर्रेमुख्तार लिल्हस्कफी का कुछ हिस्सा और अल्लामा सियूती रेह्मतुल्लाहि अलैह की अल-इत्कान से पढ़ने का शरफ हासिल किया था।

फ़िक़्ह और इफ्ता

फकीहुल इस्लाम रेह्मतुल्लाहि अलैह ने 1370 हिजरी में मज़ाहिर उलूम से फारिग़ होकर, जब मदरसे के अधिकारियों ने आपको बतौर शिक्षक नियुक्त किया, उस साल आपकी फ़िक़्ही महारत और इफ्ता (फतवा देने) की और जो उत्साह और रुझान था, उसकी वजह से मुख्तसर-उल-कुदूरी का दर्स (पाठ) सौंपा गया। फिर आपकी क्षमताओं को उभारने और निखारने के लिए, कंज़ुद्दक़ाइक का पाठ भी शामिल किया गया।
तदरीस (शिक्षा) का बिलकुल नया अनुभव, हिंदुस्तान के महान दीनि और तालीमी संस्थान में दर्स देना, इल्म-ओ-फज़ल के कई सूरज और चाँद मौजूद, आपकी कम उम्र और आपसे भी अधिक उम्र और कद के छात्र, इन सभी कारणों की वजह से पहले आपको संकोच का अनुभव हुआ। लेकिन जिस तरह से आपकी तर्बियत (परवरिश) हुई थी और जिस पैमाने पर आपने किताबों पर मेहनत की थी, उसका असर यह हुआ कि कुछ ही दिनों में यह संकोच का एहसास दूर हो गया और आप बड़ी खुशमिजाजी के साथ अपने फ़र्ज़ को अंजाम देते रहे।
दर्स-ओ-तदरीस (शिक्षा और अध्यापन) के साथ अपने फ़िक़्ही (धार्मिक कानून) ज़ौक़ ओर विजदान (रूचि और समझ) के कारण फ़िक़्ह-ओ-फतावा (धार्मिक निर्णय) की खिदमात (सेवाएं) भी अंजाम देते रहे और 14 रबीअल-अव्वल 1375 हिजरी को मुईन मुफ़्ती (सहायक मुफ़्ती) के पद पर आपका तकर्रुर (नियुक्ति) हो गया (रूदाद 1375 हिजरी)।
1 रबीअल-अव्वल 1376 हिजरी को आपको नाइब मुफ़्ती (उप-मुफ़्ती) बना दिया गया और आपके सालाना ग्रेड में इज़ाफ़ा (वृद्धि) की गई। दर्स-ओ-तदरीस की मशलूलियत (व्यस्तता) और मसरुफियत (प्रसंग) के बावजूद, आपको दारुल इफ़्ता का सदर मुफ़्ती (प्रधान मुफ़्ती) नियुक्त किया गया और आपने फ़िक़्ह-ओ-फतावा की खिदमात (सेवाओं) के साथ-साथ उलूम-ए-मुतदाविला (प्रचलित ज्ञान) की विभिन्न किताबों का दर्स (शिक्षा) दिया जैसे कंज़ुद्दक़ाइक़, शरह विकाया, मुख्तसरुल मआनी आदि। इसके अलावा, जालालैन शरीफ सात बार, अल्लामा मरगीनानी की किताब हिदाया चार बार पढ़ाई।
फ़िक़्ह-ओ-फतावा की मशलूलियत के साथ-साथ 1381 हिजरी में मिश्कात शरीफ का दर्स संबंधित हुआ। फिर नसाई शरीफ, इब्न माजा शरीफ और मिश्कात शरीफ 1383 हिजरी में पढ़ाई। फिर अगले साल 1384 हिजरी में अल्लामा तहावी रेह्मतुल्लाहि अलैह की शरहु मआनिल आसार, मिश्कात शरीफ और तिर्मिज़ी शरीफ के असबाक (पाठ) संबंधित हुए, जिनमें से अंतिम किताब, सुनन तिर्मिज़ी, कुछ सालों को छोड़कर ताहयात (जीवन भर) पढ़ाते रहे। लगभग चालीस बार तिर्मिज़ी शरीफ पढ़ाने का रिकॉर्ड कायम किया।
1384 हिजरी में आपके उस्ताद हज़रत मौलाना अमीर अहमद कांधलवी रेह्मतुल्लाहि अलैह के विसाल (निधन) के बाद, बुख़ारी और अबू दाऊद शरीफ के अलावा, दर्स-ए-हदीस शरीफ की तमाम किताबें निहायत तहक़ीक़ और जांफिशानी से पढ़ाईं। बाद में बुख़ारी और अबू दाऊद शरीफ भी पढ़ाई।
9 दिसंबर 1988 की दरमियानी रात में, जब कुछ शरारती तत्वों ने मज़ाहिर उलूम को अपनी जारहियत (आक्रमण) का निशाना बनाया और मदरसे के एक वसीअ (विस्तृत) अहाता (परिसर) दार-ए-जदीद (नई इमारत) पर पीएसी (PAC) की मदद से ग़ासिबाना क़ब्ज़ा कर लिया और दर्स-ए-हदीस शरीफ के कुछ असातिजा (शिक्षक) फरीक़-ए-मुख़ालिफ़ (विपरीत पक्ष) के हमराह हो गए, तो क़िबला फकीहुल इस्लाम रेह्मतुल्लाहि अलैह ने बुख़ारी शरीफ जिल्द-ए-सानी (जिसको हज़रत अल्लामा रफ़ीक़ अहमद रेह्मतुल्लाहि अलैह पढ़ाते थे) के अलावा तमाम किताबें और मिश्कात शरीफ का कुछ हिस्सा, ऐहतमाम (प्रबंधन) की मसरुफियतों और माहौल की नाखुशगवारी (अप्रियता) के बावजूद, निहायत वक़ार (गंभीरता) और सुकून (शांति) से पढ़ाया और तअज्जुब (आश्चर्य) की बात यह है कि हर किताब को उसके निसाब (पाठ्यक्रम) तक पढ़ाकर, मज़ाहिर उलूम की तारीख़ में एक नए बाब (अध्याय) का इज़ाफ़ा (संवर्धन) किया।
1 रमज़ान 1385 हिजरी को आपको सदर मुफ़्ती के पद पर रहते हुए नाइब नाज़िम (उप-नियामक) नियुक्त किया गया और आपकी तनख्वाह में 16 रुपये मासिक वृद्धि के साथ, 6 शव्वाल 1385 हिजरी से और सालाना ग्रेड वृद्धि 4 रुपये, 1 ज़ी-क़ादा 1385 हिजरी से की गई। अगले साल, सालाना ग्रेड वृद्धि 1 रमज़ान 1386 हिजरी से 4 रुपये मासिक विशेष रूप से आपके वेतन में बढ़ाए गए (रूदाद मदरसा 1385 हिजरी और 1386 हिजरी)।
15 ज़ी-क़ादा 1388 हिजरी को अल्लाह तआला के फज़ल-ओ-करम से आपको हज-ए-बैतुल्लाह की सआदत नसीब हुई। इस मुक़द्दस सफर में आपकी वालिदा (माता) भी साथ थीं। इस तरह, घर के अलावा सफर में भी वालिदा की खिदमत का मौका मिला। लगभग तीन महीने हरमैन शरीफैन में हज, ज़ियारत और तवाफ-ए-काबा के बाद, 25 सफर-उल-मुजफ्फर 1389 को सुरक्षित लौटकर सहारनपुर तशरीफ लाए।
आपके पीर-ओ-मुर्शिद और उस्ताद हज़रत हज़रतुल-इस्लाम मौलाना मोहम्मद असदुल्लाह साहिब रेह्मतुल्लाहि अलैह 15 रजब-उल-मुरज्जब 1399 हिजरी, सोमवार रात एक बजे इस फ़ानी दुनिया से रुख़सत फरमा कर दार-ए-जाविदानी (अनंत जीवन) की तरफ रवाना हो गए। इसके बाद आप क़ायम मकाम नाज़िम और मोहत्मिम बन गए।
अपने बुज़ुर्गों द्वारा दी गई इस बार-ए-अमानत (भरोसे की जिम्मेदारी) को क़िबला फकीहुल इस्लाम रेह्मतुल्लाहि अलैह ने न केवल संभाला, बल्कि जो सेवा भी आपके सुपुर्द की गई, उसका हक़ अदा किया। इसलिए, हज़रत अकदस मौलाना मोहम्मद ज़करिया साहिब रेह्मतुल्लाहि अलैह की मोमिनाना फितरत और ईमानी बसीरत ने फकीहुल इस्लाम रेह्मतुल्लाहि अलैह को इस भारी अमानत का सबसे अच्छा और बेहतर अमीन (विश्वासपात्र) समझते हुए, आपके लिए इस प्रबंधन का पद विशेष रूप से निर्धारित कर दिया।
"हज़रत मौलाना असदुल्लाह साहिब (रेह्मतुल्लाहि अलैह), के इंतकाल को लगभग 17 माह गुजर चुके थे। उनकी जगह जनाब मुफ्ती मुज़फ़्फ़र हुसैन साहिब बतौर क़ायम मकाम निज़ामत के फराइज़ अंजाम दे रहे थे फिर बहुत ग़ौर-ओ-ख़ौज़ (विचार-विमर्श) के बाद यह फैसला किया गया कि यह पद स्थायी तौर पर मुफ्ती मुज़फ़्फ़र हुसैन साहिब के सुपुर्द (सौंपा) किया जाए। नाइब नाज़िम और नाज़िम की बुनियादी तनख्वाह का जो एक सौ रुपये का फर्क है, वह 1 मुहर्रम 1401 हिजरी से हज़रत मुफ्ती मुज़फ़्फ़र हुसैन साहिब की मौजूदा तनख्वाह में शामिल कर दिया जाए।"
बहरहाल, बुज़ुर्गों के इस अच्छे चुनाव के बाद, 1400 हिजरी की रूदाद में आपके नाम के साथ क़ायम मकाम नाज़िम-ए-आला और 1401 हिजरी से नाज़िम-ए-मद्रसा लिखा जाने लगा।
हज़रत फकीहुल इस्लाम को चूंकि उस्ताद-ए-गरामी हज़रत मौलाना मोहम्मद ज़करिया साहिब मुहाजिर मदनी रेह्मतुल्लाहि अलैह से बेपनाह मोहब्बत और अकीदत थी, इसलिए आपसे बैअत-ओ-इरादत का रिश्ता क़ायम किया। लेकिन आपका मिजाज थानवी रंग से हमरंग था जबकि उस्ताद-ए-मुहतरम के यहाँ खलीली और रशीदी का अब्र-ए-बारां बरस ता था, इसलिए अपने मुशफ़िक़-ओ-कर्म फ़रमा हज़रत मौलाना शाह मोहम्मद असदुल्लाह साहिब रेह्मतुल्लाहि अलैह के दरबार-ए-गहर्बार में पहुंच कर तमगा-ए-खिलाफ़त और इजाज़त हासिल किया।
फकीहुल इस्लाम रेह्मतुल्लाहि अलैह से मुरशिद-ए-गरामी को जो मोहब्बत और ख़ास शफक़त थी, उसका अंदाज़ा इस से लगाया जा सकता है कि जब हज़रत फकीहुल इस्लाम हज़रत मोलाना असदुल्लाह साहिब रेह्मतुल्लाहि अलैह के खलीफाओं में शामिल हुए, तो दस्तूर यह है कि बेअत होने वाला खुश होता है लेकिन यहाँ सारा मामला उल्टा था। हज़रतुल-इस्लाम मौलाना मोहम्मद असदुल्लाह साहिब रेह्मतुल्लाहि अलैह अपने शागिर्द-ए-रशीद को खिलाफ़त देकर निहायत मस्रूर-ओ-शादां थे और खिलाफ़त भी मजम'ए आम में अता फरमाई, ताकि दुनिया को फकीहुल इस्लाम रेह्मतुल्लाहि अलैह की इस खुबी का भी पता चल जाए। यही नहीं, हज़रत मुरशिद-ए-गरामी की खुशी का इस से भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अपने मुसाहिबीन और हाज़रीन को मुख़ातिब करके फरमाया कि
"शेख-उल-हदीस (हज़रत मौलाना मोहम्मद ज़करिया) साहिब रेह्मतुल्लाहि अलैह (इस वक्त शेख-उल-हदीस मक्का मुक़र्रमा में थे) को इसकी इत्तेला कर दो कि मैंने आज मुफ्ती मुज़फ़्फ़र हुसैन साहिब को इजाज़त-ए-बैअत-ओ-खिलाफ़त दे दी है।"
28 रमज़ान-उल-मुबारक 1424 हिजरी की सुबह 10 बजे दिल्ली के एस्कॉर्ट अस्पताल में दिल की धड़कन बंद हो जाने की वजह से हज़रत फकीहुल इस्लाम का इंतकाल हो गया। इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन ।
जांनशीन (उत्तराधिकारी) फकीहुल इस्लाम हज़रत मौलाना मोहम्मद सईदी की इमामत में रात लगभग बारह बजे नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की गई, जिसमें अनुमानित तीन लाख का मज़मा (भीड़) था।
तदफीन (दफन) हाजी शाह कमालुद्दीन के कब्रिस्तान में, अपने वालिद (पिता) और हज़रत-ए-असातिज़ा (शिक्षकों) के पास की गई।